
पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित किताब को लेकर संसद में जबरदस्त हंगामा देखने को मिला। जैसे ही किताब के कुछ कथित अंशों का हवाला विपक्ष की ओर से दिया गया, दोनों सदनों का माहौल अचानक गरमा गया। विपक्ष का आरोप है कि किताब में राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य निर्णयों और राजनीतिक नेतृत्व से जुड़े संवेदनशील मुद्दों का उल्लेख किया गया है, जिन पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार को घेरते हुए कहा कि अगर एक पूर्व आर्मी चीफ अपने अनुभवों में ऐसी बातें लिख रहे हैं, तो उन्हें नजरअंदाज करना देश और लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर पारदर्शिता से बच रही है और संसद में चर्चा से भाग रही है। उनके बयान के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा कि सेना और पूर्व सैन्य अधिकारियों की प्रतिष्ठा को राजनीति का हथियार बनाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी अप्रकाशित किताब सरकार की आधिकारिक नीति या रुख को नहीं दर्शाती और संवेदनशील मामलों पर आवश्यक संस्थागत प्रक्रियाएं पहले से मौजूद हैं। इस दौरान गृह मंत्री अमित शाह भी बहस में कूद पड़े और विपक्ष पर सेना के मनोबल को गिराने का आरोप लगाया। शाह ने कहा कि सरकार सेना का सम्मान करती है और किसी भी तरह की अटकलों या अधूरी जानकारियों के आधार पर निष्कर्ष निकालना गलत है। बहस इतनी तीखी हो गई कि कई बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी और दोनों पक्षों के सांसद नारेबाजी करते नजर आए। सत्ता पक्ष का कहना था कि विपक्ष जानबूझकर एक अप्रकाशित किताब को मुद्दा बनाकर संसद की गरिमा को ठेस पहुंचा रहा है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही से जोड़कर देख रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पूर्व सैन्य अधिकारियों की निजी किताबों में लिखी बातों पर संसद में बहस होनी चाहिए या नहीं। फिलहाल यह मुद्दा सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर और तीखी राजनीति होने की संभावना जताई जा रही है।



