
हिमालयी क्षेत्र में तेजी से पिघलते ग्लेशियर अब मानव जीवन और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे का रूप ले चुके हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों में बनी झीलों का आकार लगातार बढ़ रहा है और इनके फटने की घटनाएं तबाही का कारण बन रही हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अब तक ग्लेशियल झीलों के फटने से 609 से अधिक बड़ी आपदाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 13 हजार से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लाखों लोग बेघर हुए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ गई है, जिससे हिमालयी राज्यों में बाढ़, भूस्खलन और अचानक आने वाली आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। इन आपदाओं से न केवल जनजीवन प्रभावित होता है, बल्कि सड़कें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और गांव पूरी तरह तबाह हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने समय रहते चेतावनी दी है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण नहीं पाया गया और ग्लेशियरों की निगरानी के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में यह खतरा और भी भयावह रूप ले सकता है। ऐसे में हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली, आपदा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण पर तत्काल ध्यान देना बेहद जरूरी हो गया है।



