
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यदि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद होने जैसी स्थिति बनती है, तो उसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ता है। दुनिया के लगभग एक-तिहाई समुद्री कच्चे तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। ऐसे में सप्लाई बाधित होने की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 10 प्रतिशत तक उछाल देखा गया है। भारत, जो अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इस झटके से अछूता नहीं रह सकता।
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का पहला असर भारत के आयात बिल पर पड़ेगा। अगर कच्चा तेल 10 प्रतिशत महंगा होता है, तो इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है और चालू खाता घाटा भी बढ़ने की आशंका रहती है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सीधे बढ़ोतरी हो या न हो, लेकिन सरकार पर सब्सिडी और टैक्स संतुलन का दबाव जरूर बढ़ेगा। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों में भी इजाफा हो सकता है, जिससे महंगाई दर ऊपर जा सकती है।
हालांकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाई है। इराक, सऊदी अरब और यूएई के अलावा रूस से भी भारत ने रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना बढ़ाया है। इसके बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य का सामरिक महत्व इतना बड़ा है कि वहां किसी भी रुकावट से वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ जाती है और कीमतों में तेजी आ जाती है।
तेल महंगा होने से रुपये पर भी दबाव बन सकता है, क्योंकि ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। इससे आयातित वस्तुएं और महंगी हो सकती हैं। रिजर्व बैंक को महंगाई नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों पर सख्त रुख अपनाना पड़ सकता है, जिससे कर्ज महंगा हो सकता है और निवेश पर असर पड़ सकता है। हालांकि सरकार के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserve) का विकल्प मौजूद है, जिससे अल्पकालिक राहत मिल सकती है।
कुल मिलाकर, होर्मुज स्ट्रेट में तनाव भारत के लिए केवल तेल की कीमतों का मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक संतुलन की चुनौती है। यदि स्थिति लंबी चली तो महंगाई, चालू खाता घाटा और राजकोषीय दबाव जैसे कई मोर्चों पर असर दिख सकता है। फिलहाल भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन, आयात स्रोतों का विस्तार और वैकल्पिक ऊर्जा पर निवेश ही दीर्घकालिक समाधान साबित हो सकते हैं।



