
भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर कनाडा को कड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि उसने पिछले 40 वर्षों से आतंकवादी गतिविधियों पर चुप्पी साध रखी है और अब भारत को उपदेश देने का नैतिक अधिकार नहीं रखता। भारत का यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। भारत ने साफ शब्दों में कहा कि आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक चुनौती है, और इस पर चयनात्मक रवैया अपनाना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक है। भारत का आरोप है कि कनाडा की धरती का इस्तेमाल लंबे समय से भारत विरोधी और अलगाववादी गतिविधियों के लिए किया जा रहा है, लेकिन कनाडाई प्रशासन ने या तो आंखें मूंद रखी हैं या फिर राजनीतिक कारणों से जानबूझकर कार्रवाई से बचता रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिंसा, नफरत और आतंकवाद को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। भारत ने याद दिलाया कि 1980 के दशक से लेकर अब तक खालिस्तानी उग्रवाद ने भारत में हजारों निर्दोष लोगों की जान ली, लेकिन उस दौर में भी कई देशों ने इस खतरे को गंभीरता से नहीं लिया। भारत का कहना है कि आतंकवाद पर “अच्छा” और “बुरा” का भेद करना बंद होना चाहिए, क्योंकि यही दोहरे मापदंड आतंकियों को पनपने का मौका देते हैं। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा। कूटनीतिक स्तर पर भारत ने कनाडा से अपेक्षा जताई कि वह सबूतों के आधार पर कार्रवाई करे, न कि आरोपों और राजनीतिक बयानों के सहारे रिश्तों में तनाव बढ़ाए। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह सख्त रुख केवल कनाडा के लिए नहीं, बल्कि उन सभी देशों के लिए संदेश है जो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ढुलमुल रवैया अपनाते हैं। भारत ने एक बार फिर दोहराया कि वैश्विक शांति और स्थिरता तभी संभव है जब सभी देश बिना किसी भेदभाव के आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर कार्रवाई करें और किसी भी रूप में उसे समर्थन या संरक्षण न दें।



