
मुंबई के प्रसिद्ध जुहू तट पर छठ महापर्व का आयोजन अब एक भव्य उत्सव का रूप ले चुका है। जहां 34 साल पहले महज 60 परिवारों ने इस पर्व की शुरुआत की थी, वहीं आज यह आयोजन लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक बन चुका है। बिहार और उत्तर प्रदेश से जुड़े लोगों के लिए यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि सांस्कृतिक एकता और परंपरा को जीवित रखने का भी माध्यम बन गया है। मुंबई जैसी तेज़ रफ्तार जिंदगी में भी लोग चार दिन तक चलने वाले इस व्रत को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से निभाते हैं।
छठ पूजा में सूर्य देव की उपासना की जाती है और यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का प्रतीक माना जाता है। जुहू तट पर जब हजारों की संख्या में श्रद्धालु अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो दृश्य अत्यंत मनमोहक और आध्यात्मिक अनुभूति से भरा होता है। प्रशासन और स्थानीय समितियों की ओर से इस पर्व को सफल बनाने के लिए व्यापक इंतजाम किए जाते हैं — जैसे सुरक्षा, सफाई, रोशनी और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था।
इस आयोजन की शुरुआत 1991 में हुई थी, जब कुछ प्रवासी परिवारों ने मुंबई में अपने घरों से दूर रहते हुए छठ पर्व मनाने का संकल्प लिया था। धीरे-धीरे यह छोटा प्रयास पूरे महानगर के उत्तर भारतीय समुदाय की पहचान बन गया। अब हर साल जुहू बीच पर न केवल मुंबई बल्कि ठाणे, नवी मुंबई और विरार जैसे इलाकों से भी हजारों श्रद्धालु आते हैं।
आज यह उत्सव केवल पूजा का नहीं बल्कि लोकगीतों, पारंपरिक प्रसाद और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन गया है। महिलाएं पारंपरिक व्रत गीत गाती हैं और बच्चे उत्सव के माहौल का आनंद लेते हैं। जुहू तट की यह छठ पूजा अब मुंबई के सांस्कृतिक कैलेंडर का एक प्रमुख हिस्सा बन चुकी है, जो हर साल श्रद्धा, भक्ति और एकजुटता का अद्भुत संदेश देती है।



