
दुनिया में सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडार होने के बावजूद वेनेज़ुएला आज गंभीर आर्थिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है। कभी लैटिन अमेरिका के समृद्ध देशों में गिना जाने वाला यह देश आज महंगाई, बेरोज़गारी, खाद्य संकट और बड़े पैमाने पर पलायन जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। इसकी मुख्य वजह अर्थव्यवस्था का अत्यधिक तेल पर निर्भर होना माना जाता है। जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरीं, तो देश की आय अचानक कम हो गई। पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज़ के दौर में तेल से होने वाली कमाई को सामाजिक योजनाओं पर बड़े पैमाने पर खर्च किया गया, लेकिन उद्योगों के विविधीकरण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उनके बाद सत्ता में आए निकोलस मादुरो के कार्यकाल में हालात और बिगड़े। सरकारी नीतियों, मुद्रा नियंत्रण और भ्रष्टाचार ने आर्थिक ढांचे को कमजोर कर दिया। अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने भी तेल निर्यात को प्रभावित किया, जिससे विदेशी मुद्रा की भारी कमी हो गई। नतीजतन, देश में हाइपरइन्फ्लेशन की स्थिति पैदा हुई और आम लोगों के लिए रोजमर्रा की चीजें खरीदना मुश्किल हो गया। स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गईं, अस्पतालों में दवाओं की कमी हो गई और कुपोषण के मामले बढ़े। लाखों लोग बेहतर जीवन की तलाश में पड़ोसी देशों की ओर पलायन कर गए। वेनेज़ुएला का उदाहरण बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता ही समृद्धि की गारंटी नहीं होती; मजबूत संस्थाएं, पारदर्शी शासन और संतुलित आर्थिक नीतियां भी उतनी ही जरूरी हैं।



