
अमेरिका द्वारा जारी की गई तथाकथित ‘नई G20 सूची’ से दक्षिण अफ्रीका का बाहर होना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा चर्चा का विषय बन गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने इस निर्णय के पीछे जो वजह बताई, वह वैश्विक कूटनीति, आर्थिक सहयोग और दक्षिण अफ्रीका की हालिया विदेश नीति पर केंद्रित है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका का मानना है कि दक्षिण अफ्रीका ने पिछले कुछ वर्षों में कई महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर “असंतुलित रुख” अपनाया, विशेषकर रूस–यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व संघर्ष के दौरान। अमेरिका के मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका का झुकाव रूस की ओर अधिक दिखाई दिया, जो G20 जैसे मंच पर “तटस्थता और वैश्विक जिम्मेदारी” की भावना के विपरीत माना गया।
अमेरिकी विदेश मंत्री का कहना है कि G20 का उद्देश्य वैश्विक आर्थिक स्थिरता, लोकतांत्रिक मूल्यों और साझा विकास को बढ़ावा देना है। ऐसे में किसी भी सदस्य राष्ट्र का किसी एक वैश्विक शक्ति की ओर खुला समर्थन, समूह की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। दक्षिण अफ्रीका की हालिया कूटनीतिक गतिविधियों—जैसे रूस के साथ सैन्य अभ्यास, BRICS में पश्चिमी नीतियों का खुला विरोध, तथा यूक्रेन युद्ध को लेकर निरंतर मिलनसार रुख—ने अमेरिका को यह महसूस कराया कि दक्षिण अफ्रीका G20 की प्राथमिकताओं से “दूरी” बना चुका है।
इसके अलावा, अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया कि दक्षिण अफ्रीका की आर्थिक स्थिति भी G20 मंच पर उसकी भूमिका को प्रभावित करती है। बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के मामलों में वृद्धि और विदेशी निवेश में कमी—इन कारकों ने भी दक्षिण अफ्रीका की वैश्विक विश्वसनीयता को कमजोर किया है। हालांकि, दक्षिण अफ्रीका ने अमेरिका के इस कदम की आलोचना करते हुए इसे “राजनीतिक दबाव” बताया और कहा कि G20 की मूल संरचना को कोई एक देश बदल नहीं सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल आर्थिक या कूटनीतिक कारणों से ही नहीं, बल्कि अमेरिका-चीन की बढ़ती प्रतिस्पर्धा और वैश्विक ध्रुवीकरण का हिस्सा भी है। अमेरिका उन देशों को अपने करीब रखना चाहता है जो उसके रणनीतिक हितों का समर्थन करें, जबकि दक्षिण अफ्रीका लगातार BRICS+ ब्लॉक को मजबूत करने में जुटा है, जो पश्चिमी देशों के प्रभाव को चुनौती देता है। कुल मिलाकर, यह कदम आने वाले महीनों में G20 की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय समीकरणों में नई बहस को जन्म देगा।



