
UGC के नए नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई हुई, जिसमें इन नियमों पर रोक लगाने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा बनाए गए नए नियम संविधान के तहत प्रदत्त शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता का उल्लंघन करते हैं। वकील का कहना था कि इन नियमों के जरिए केंद्र सरकार और UGC का दखल विश्वविद्यालयों के आंतरिक प्रशासन, नियुक्तियों और अकादमिक फैसलों में अत्यधिक बढ़ जाएगा, जिससे संघीय ढांचे और उच्च शिक्षा की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा। उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है और राज्यों को भी इसमें समान अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन नए नियम राज्यों की भूमिका को सीमित करते हैं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी कहा कि नए नियम बिना पर्याप्त परामर्श के लागू किए गए हैं और इससे पहले से कार्यरत नियमों व अधिनियमों के साथ टकराव की स्थिति बन रही है। वकीलों ने कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया कि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति, शिक्षकों की भर्ती और शैक्षणिक मानकों को लेकर पहले से स्पष्ट कानून मौजूद हैं, ऐसे में UGC को इनके ऊपर नए नियम थोपने का अधिकार नहीं है।
इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट यह समझना चाहता है कि UGC के अधिकारों की सीमा क्या है और क्या वह ऐसे नियम बना सकता है जो सीधे तौर पर विश्वविद्यालयों के प्रशासन को प्रभावित करें। CJI ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसके साथ-साथ संवैधानिक संतुलन और संस्थानों की स्वायत्तता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कोर्ट इस बात की जांच करेगा कि नए नियम केवल मार्गदर्शक प्रकृति के हैं या बाध्यकारी, और क्या इनके लागू होने से राज्यों और विश्वविद्यालयों के अधिकारों का अतिक्रमण होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अगली तारीख तय करने का संकेत दिया और कहा कि विस्तृत सुनवाई के बाद ही किसी अंतरिम राहत या रोक पर फैसला लिया जाएगा। इस मामले को उच्च शिक्षा से जुड़े हितधारक बेहद अहम मान रहे हैं, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाले समय में देश की विश्वविद्यालयी व्यवस्था और शैक्षणिक स्वायत्तता की दिशा तय कर सकता है।



