
भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता एक बार फिर सुर्खियों में है। कभी 50 प्रतिशत तक की टैरिफ दरों की आशंका, फिर 18 प्रतिशत पर सिमटती उम्मीदें और अब 10 प्रतिशत के आसपास संभावित समझौते की चर्चा ने भारतीय निर्यातकों को असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया है। अमेरिकी बाजार भारत के लिए सबसे बड़े निर्यात गंतव्यों में से एक है, जहां टेक्सटाइल, फार्मा, ऑटो पार्ट्स, आईटी सेवाएं और इंजीनियरिंग उत्पादों की बड़ी हिस्सेदारी है। ऐसे में टैरिफ संरचना में थोड़ा सा बदलाव भी करोड़ों डॉलर के व्यापार को प्रभावित कर सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंध मजबूत हुए हैं, लेकिन व्यापारिक मोर्चे पर कई मुद्दे अब भी अटके हुए हैं। अमेरिका लगातार बाजार पहुंच, कृषि उत्पादों पर शुल्क, ई-कॉमर्स नियम और बौद्धिक संपदा अधिकार जैसे मुद्दों को उठाता रहा है। वहीं भारत अपने घरेलू उद्योग और एमएसएमई क्षेत्र की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। टैरिफ दरों में 50 से 18 और अब 10 प्रतिशत तक की संभावित कमी को लेकर जो अटकलें लगाई जा रही हैं, वे इस बात का संकेत हैं कि वार्ता निर्णायक मोड़ पर है, लेकिन अंतिम सहमति अभी दूर है।
भारतीय निर्यातकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि समझौता संतुलित नहीं हुआ तो अमेरिकी प्रतिस्पर्धा भारतीय बाजार में बढ़ सकती है, जबकि भारतीय उत्पादों को अपेक्षित रियायतें नहीं मिलेंगी। खासकर स्टील, एल्युमिनियम और टेक्सटाइल सेक्टर पहले ही वैश्विक मांग में सुस्ती का सामना कर रहे हैं। यदि टैरिफ घटकर 10 प्रतिशत पर स्थिर होते हैं तो कुछ क्षेत्रों को राहत मिल सकती है, लेकिन जिन उत्पादों पर पहले से ही कम मार्जिन है, उनके लिए यह भी पर्याप्त नहीं होगा।
इसके अलावा, भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी इस वार्ता को प्रभावित कर रही हैं। अमेरिका ‘फ्रेंडशोरिंग’ और सप्लाई चेन विविधीकरण की नीति के तहत भारत को अहम साझेदार मानता है, लेकिन वह अपने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा से समझौता नहीं करना चाहता। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह निर्यात प्रतिस्पर्धा बनाए रखते हुए घरेलू विनिर्माण को भी सशक्त करे।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देश व्यापक व्यापार समझौते की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं तो दीर्घकाल में लाभ दोनों को होगा। परंतु अल्पकाल में अनिश्चितता, बदलती टैरिफ दरें और नीति स्पष्टता की कमी भारतीय निर्यातकों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। आने वाले महीनों में होने वाली उच्चस्तरीय बैठकों पर सभी की नजरें टिकी हैं। यह तय करेगा कि 50 से 10 प्रतिशत तक का यह उतार-चढ़ाव स्थायी समाधान में बदलेगा या फिर व्यापारिक तनाव का नया अध्याय शुरू होगा।



