मेडिकल साइंस ने एक बार फिर भविष्य की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाते हुए IVF तकनीक में ऐतिहासिक बदलाव किया है। अब तक प्रजनन की सामान्य प्रक्रिया दो लोगों के डीएनए पर आधारित थी — एक माता और एक पिता। लेकिन अब, वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक के जरिए तीन लोगों के DNA से बच्चों का जन्म कर दिखाया है। इस प्रक्रिया को माइटोकॉन्ड्रियल डोनेशन (Mitochondrial Donation) तकनीक कहा जाता है, जिसमें बच्चे के जीवन को आनुवांशिक बीमारियों से बचाने के लिए तीसरे व्यक्ति — आमतौर पर एक महिला डोनर — के स्वस्थ माइटोकॉन्ड्रिया का उपयोग किया जाता है। इस तकनीक की मदद से अब तक 8 स्वस्थ बच्चों का जन्म हो चुका है, और यह दुनिया भर में चिकित्सा और बायोटेक्नोलॉजी क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी उपलब्धि मानी जा रही है।
इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य ऐसे आनुवांशिक विकारों को रोकना है, जो माइटोकॉन्ड्रिया में पाए जाते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी फैल सकते हैं। यह तकनीक, जहाँ एक ओर गंभीर बीमारियों से सुरक्षा देती है, वहीं दूसरी ओर नैतिक और सामाजिक बहसों को भी जन्म दे रही है — क्या हम अब वास्तव में ‘डिजाइनर बेबी’ के युग में प्रवेश कर चुके हैं? क्या भविष्य में माता-पिता अपने बच्चों की आंखों का रंग, बुद्धिमत्ता या शारीरिक क्षमताओं को चुन सकेंगे? ये प्रश्न केवल विज्ञान से नहीं, समाज और नैतिकता से भी जुड़े हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह खोज चिकित्सा जगत के लिए मील का पत्थर है, जो ना सिर्फ असाध्य बीमारियों को मात देने में सहायक होगी, बल्कि मानव विकास की दिशा को भी नई परिभाषा देगी।
यह तकनीक कैसे काम करती है?
तीन डीएनए से बच्चे पैदा करने की यह तकनीक मूल रूप से माइटोकॉन्ड्रियल रिप्लेसमेंट थैरेपी (MRT) पर आधारित है। माइटोकॉन्ड्रिया, जो हर कोशिका में मौजूद एक ऊर्जा-स्रोत अंग होता है, उसमें भी डीएनए पाया जाता है। यदि किसी महिला के माइटोकॉन्ड्रिया में अनुवांशिक दोष हो, तो उसके बच्चे को गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं। इस तकनीक में माँ के अंडाणु से दोषपूर्ण माइटोकॉन्ड्रिया हटा दिया जाता है और एक डोनर महिला के स्वस्थ माइटोकॉन्ड्रिया को उसमें जोड़ा जाता है। फिर इस अंडाणु को पिता के शुक्राणु से निषेचित किया जाता है। नतीजतन, पैदा हुए बच्चे के पास तीन लोगों का डीएनए होता है — माँ, पिता और डोनर महिला का।
वैज्ञानिक उपलब्धि या नैतिक संकट?
जहाँ एक ओर यह तकनीक गंभीर आनुवांशिक बीमारियों से निजात दिलाने में सहायक है, वहीं दूसरी ओर यह नैतिक और धार्मिक विवादों को भी जन्म देती है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तकनीक से ‘प्राकृतिक जन्म’ की परिभाषा ही बदल सकती है। इससे यह आशंका भी बढ़ती है कि भविष्य में अमीर और शक्तिशाली लोग ‘परफेक्ट बेबी’ डिज़ाइन करने की कोशिश करेंगे — यानी ज़रूरत के अनुसार गुण चुनना, जैसे कि बुद्धिमत्ता, ऊंचाई, आंखों का रंग या प्रतिभा। इससे सामाजिक असमानता और “जेनेटिक भेदभाव” जैसी नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसीलिए कुछ देशों में इस तकनीक पर कानूनी रूप से रोक भी लगी हुई है।
भारत और अन्य देशों में स्थिति
अभी यह तकनीक ब्रिटेन जैसे कुछ गिने-चुने देशों में ही वैध है और सख्त निगरानी के तहत इस्तेमाल की जा रही है। भारत में इस पर गंभीर बहस तो चल रही है लेकिन कानूनी रूप से इसे अभी अनुमति नहीं मिली है। भारत जैसे देश में, जहाँ पहले से ही IVF और सरोगेसी को लेकर सामाजिक और कानूनी जटिलताएँ हैं, वहाँ तीन डीएनए वाली तकनीक को अपनाना कई नई चुनौतियों को जन्म दे सकता है — जैसे पहचान का संकट, विरासत के अधिकार, और बच्चे के कानूनी माता-पिता कौन होंगे?
भविष्य की राह — संभावनाएँ और सीमाएँ
इस तकनीक से एक नई उम्मीद ज़रूर जगी है — विशेष रूप से उन परिवारों के लिए जो पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवांशिक बीमारियों का सामना कर रहे हैं। लेकिन यह भी जरूरी है कि इसे पूरी वैज्ञानिक पारदर्शिता और नैतिक विवेक के साथ आगे बढ़ाया जाए। वैज्ञानिकों को न केवल इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर शोध करना होगा, बल्कि नीति-निर्माताओं को भी स्पष्ट कानून और दिशानिर्देश बनाने होंगे ताकि इस तकनीक का दुरुपयोग रोका जा सके।



