
हाल ही में चर्चा में आए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारतीय सेना की रणनीति में बड़े बदलाव की बात सामने आ रही है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, सेना अब पारंपरिक लंबी तैयारी और बड़े पैमाने की तैनाती की बजाय तेज, सटीक और सीमित समय में प्रभावी कार्रवाई पर जोर दे रही है। इसी बदलाव को नया ‘कोल्ड स्ट्राइक’ डॉक्ट्रिन कहा जा रहा है। यह रणनीति पहले से प्रचलित ‘कोल्ड स्टार्ट’ सिद्धांत का उन्नत और तकनीकी रूप मानी जा रही है, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन सर्विलांस, सैटेलाइट इंटेलिजेंस और साइबर क्षमताओं का व्यापक उपयोग शामिल है।
‘कोल्ड स्ट्राइक’ का मूल उद्देश्य है—दुश्मन को बिना लंबी चेतावनी के सीमित लेकिन निर्णायक जवाब देना। इसमें सीमा पार बड़े पैमाने पर घुसपैठ की बजाय सटीक लक्ष्य भेदने की क्षमता विकसित की गई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति आधुनिक युद्ध की आवश्यकताओं के अनुरूप है, जहां समय, सूचना और तकनीक ही सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं।
इस नई नीति में थल सेना, वायु सेना और नौसेना के बीच बेहतर समन्वय पर जोर दिया गया है। इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप (IBG) जैसी संरचनाओं को और अधिक सक्षम बनाया जा रहा है, ताकि किसी भी आकस्मिक स्थिति में 24 से 48 घंटे के भीतर जवाबी कार्रवाई संभव हो सके। इसके साथ ही स्वदेशी हथियार प्रणालियों और मिसाइल तकनीक को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे आत्मनिर्भरता भी बढ़े।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। सीमाओं पर बढ़ती चुनौतियों और हाइब्रिड वारफेयर के खतरे को देखते हुए भारत ने अपनी सैन्य नीति को अधिक लचीला और तकनीक-आधारित बनाया है। ‘कोल्ड स्ट्राइक’ का संदेश स्पष्ट है—भारत शांति चाहता है, लेकिन किसी भी उकसावे का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह रणनीति न केवल सामरिक स्तर पर बल्कि कूटनीतिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति को मजबूत करती है।



