
तीसरी दुनिया के देश’ शब्द का प्रयोग आज भले ही कम हो रहा हो, लेकिन इसका जन्म शीत युद्ध के दौर में हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व दो ध्रुवों—अमेरिका और सोवियत संघ—में बंट गया था। उस समय वे देश जो न अमेरिका के साथ थे और न सोवियत ब्लॉक में शामिल हुए, उन्हें ‘थर्ड वर्ल्ड’ या ‘तीसरी दुनिया’ कहा गया। इन देशों में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील राष्ट्र शामिल थे। समय के साथ यह शब्द सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन से जोड़ दिया गया, जबकि वास्तविकता यह थी कि ये देश स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने के इच्छुक थे।
आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति बदल चुकी है, लेकिन ‘तीसरी दुनिया’ या ‘ग्लोबल साउथ’ देशों की अहमियत और बढ़ गई है। चीन का उभार, रूस-अमेरिका तनाव, मध्य पूर्व की भू-राजनीति, और नई आर्थिक शक्तियों के उदय ने वैश्विक शक्ति संतुलन को फिर बदल दिया है। ऐसे में अमेरिका कई विकासशील देशों पर रोक, प्रतिबंध या दबाव बढ़ाने की रणनीति अपनाने की तैयारी में दिख रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि इन देशों की विदेशी नीति अब पहले जैसी अमेरिका-पक्षीय नहीं रही और वे बहुध्रुवीय दुनिया की ओर झुकाव दिखा रहे हैं।
अमेरिका को चिंता है कि कई ‘ग्लोबल साउथ’ देश चीन की बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव, रूस के सुरक्षा सहयोग और पश्चिमी नीतियों के विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही ये देश संयुक्त राष्ट्र, G20 और BRICS जैसे मंचों पर सामूहिक रूप से अपनी आवाज मजबूत कर रहे हैं। अमेरिका समझता है कि यदि ये देश एकजुट होकर आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को बढ़ाते हैं, तो वैश्विक शक्ति समीकरण में उसकी श्रेष्ठता को चुनौती मिल सकती है। इसी कारण वह व्यापार प्रतिबंधों, तकनीकी एक्सेस पर रोक, सैन्य सहयोग में कटौती और राजनीतिक दबाव जैसे विभिन्न उपायों पर विचार कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की यह रणनीति केवल रोक लगाने तक सीमित नहीं, बल्कि इन देशों को अपनी ओर पुनः आकर्षित करने का प्रयास भी है। वह जलवायु वित्त, तकनीकी निवेश, सुरक्षा सहायता और लोकतंत्र के नाम पर रणनीतिक साझेदारी बढ़ाना चाहता है। हालांकि, इन देशों की नई पीढ़ी की नेतृत्वकारी सोच उन्हें किसी भी एक शक्ति-गुट में सीमित नहीं रहना चाहती।
कुल मिलाकर, शीत युद्ध ने ‘तीसरी दुनिया’ की अवधारणा को जन्म दिया था, लेकिन आज वही देश विश्व राजनीति के केंद्र में हैं। अमेरिका उनकी बढ़ती भू-राजनीतिक भूमिका को लेकर सतर्क है और यही वजह है कि वह इन पर रोक और कड़े कदमों की रणनीति तैयार कर रहा है।



