देहरादून में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान CDS जनरल अनिल चौहान ने भारत और चीन के बीच हुए पंचशील समझौते की पृष्ठभूमि पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह समझौता उस समय दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया था। उस दौर में नवस्वतंत्र भारत अपनी विदेश नीति को संतुलित और सिद्धांत आधारित बनाना चाहता था, जबकि चीन के साथ संबंधों को सकारात्मक दिशा देना भी प्राथमिकता थी। पंचशील के पांच सिद्धांतों ने दोनों देशों के रिश्तों को एक औपचारिक आधार प्रदान किया, हालांकि बाद के वर्षों में परिस्थितियां बदलती रहीं।
जनरल अनिल चौहान ने अपने संबोधन में कहा कि उस समय वैश्विक राजनीति शीत युद्ध के दौर से गुजर रही थी और नवस्वतंत्र भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की पहचान स्थापित करना चाहता था। ऐसे में चीन के साथ शांतिपूर्ण संबंधों का संदेश देना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया। पंचशील के सिद्धांत—एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, समानता और पारस्परिक लाभ—उसी सोच का परिणाम थे।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उस दौर में एशिया में सहयोग और स्थिरता की भावना को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही थी। भारत की कोशिश थी कि वह किसी गुट का हिस्सा बनने के बजाय सिद्धांत आधारित कूटनीति अपनाए। पंचशील समझौता इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा था, जिसने शुरुआती वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों को सकारात्मक दिशा दी, भले ही बाद में सीमा विवाद और अन्य कारणों से दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला।
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