मालेगांव ब्लास्ट केस में अदालत से बरी होने के बाद भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा,
“आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता और न ही उसका कोई धर्म होता है। भगवा को आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश एक सुनियोजित साजिश थी।”
उनका यह बयान न केवल एक राजनीतिक संदेश था, बल्कि उन वर्षों की पीड़ा को भी व्यक्त करता है, जो उन्होंने एक आरोपी के तौर पर जेल और अदालतों के चक्कर काटते हुए बिताए।
साध्वी प्रज्ञा ने मालेगांव विस्फोट के दौरान अपने ऊपर लगे आरोपों को राजनीतिक और वैचारिक द्वेष का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि उन्हें ‘हिन्दू आतंकवाद’ की झूठी थ्योरी के तहत फंसाया गया, ताकि देश की प्राचीन संस्कृति और सनातन परंपरा को बदनाम किया जा सके।
उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा,
“मैंने भगवा पहना है, जो त्याग, तपस्या और राष्ट्रसेवा का प्रतीक है। उसी भगवा को आतंकवाद से जोड़कर मुझे मानसिक, शारीरिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया गया। यह केवल मेरे खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे सनातन धर्म और उसकी विचारधारा के खिलाफ षड्यंत्र था।”
साध्वी ने अपने बयान में यह भी कहा कि अब जब अदालत ने उन्हें क्लीन चिट दी है, तो देश की जनता को यह समझना चाहिए कि सच कितना दबाया गया और किस तरह से राजनीतिक लाभ के लिए धर्म को निशाना बनाया गया। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या अब उनके बरसों बर्बाद हुए जीवन का कोई हिसाब देगा?
उनका कहना था कि यदि वे साध्वी न होतीं, भगवा वस्त्रधारी न होतीं, तो शायद उनके साथ ऐसा व्यवहार न होता।
“मुझे सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया गया क्योंकि मैं हिंदू धर्म और राष्ट्रवाद की बात करती थी।” उन्होंने कहा कि आगे वे राष्ट्र सेवा, गौ रक्षा और हिन्दू संस्कृति के प्रचार-प्रसार में और अधिक समर्पित होकर कार्य करेंगी।
साध्वी प्रज्ञा के इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में भी हलचल देखी जा रही है। भाजपा ने उनके साथ खड़े होते हुए कहा कि इस फैसले से सिद्ध हो गया है कि पहले की सरकारें राजनीतिक प्रतिशोध में निर्दोषों को निशाना बनाती थीं। वहीं विपक्ष का कहना है कि फैसला अदालत का है, लेकिन जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से काम करने देना चाहिए।



