18 के बाद बच्चों पर हुक्म नहीं, दोस्ती का रिश्ता बनाएं; रोकटोक से घटता है आत्मविश्वास

बच्चे जैसे ही 18 वर्ष की आयु पार करते हैं, उनकी दुनिया तेजी से बदलने लगती है। वे कानूनी रूप से वयस्क होते हैं, अपने फैसले खुद लेने की इच्छा रखते हैं और अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। ऐसे समय में माता-पिता की भूमिका भी बदलनी जरूरी हो जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस उम्र के बाद बच्चों के बॉस बनने के बजाय उनके दोस्त बनना ज्यादा प्रभावी होता है। लगातार रोकटोक, हर निर्णय पर सवाल या जरूरत से ज्यादा नियंत्रण उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। युवा मन स्वतंत्रता चाहता है, लेकिन साथ ही सही मार्गदर्शन और भावनात्मक सहारे की भी उतनी ही जरूरत होती है। अगर माता-पिता आदेश देने के बजाय संवाद का रास्ता चुनें, तो बच्चे अपनी उलझनें खुलकर साझा करते हैं।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार 18 के बाद की उम्र करियर, रिश्तों और भविष्य को लेकर दुविधाओं से भरी होती है। यदि घर का माहौल सहयोगी हो, तो युवा बेहतर निर्णय ले पाते हैं। बार-बार तुलना करना, डांटना या ‘हम ज्यादा जानते हैं’ वाला रवैया अपनाना उन्हें भीतर से असुरक्षित बना सकता है। इसके विपरीत, जब माता-पिता सुनते हैं, समझते हैं और जरूरत पड़ने पर सुझाव देते हैं, तो भरोसे का रिश्ता मजबूत होता है। यही भरोसा आगे चलकर मुश्किल समय में काम आता है।
दोस्ती जैसा रिश्ता बनाने का मतलब अनुशासन खत्म करना नहीं है, बल्कि संवाद की शैली बदलना है। सीमाएं तय की जा सकती हैं, पर उन्हें थोपने के बजाय समझाकर अपनाया जाए। बच्चों की पसंद-नापसंद, उनके सपनों और चुनौतियों में रुचि लेना उन्हें यह अहसास कराता है कि परिवार उनके साथ खड़ा है। इससे उनका आत्मबल बढ़ता है और वे जिम्मेदार बनते हैं।
तेजी से बदलते दौर में पेरेंटिंग का तरीका भी बदल रहा है। आज के युवाओं को आदेश नहीं, सहभागिता चाहिए। जब माता-पिता दोस्त की तरह मार्गदर्शक बनते हैं, तो घर का वातावरण सकारात्मक रहता है और बच्चे आत्मविश्वास के साथ जीवन की राह पर आगे बढ़ते हैं।



