
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका को लेकर उस समय दिलचस्प स्थिति बन गई जब प्याज और लहसुन के सेवन से जुड़े कथित प्रभावों पर वैज्ञानिक शोध कराने की मांग की गई। इस याचिका की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने याचिकाकर्ता के वकील को कड़ी फटकार लगाते हुए सवाल किया कि क्या इस तरह की याचिकाएं आधी रात को बैठकर ड्राफ्ट की जाती हैं। अदालत की इस टिप्पणी के बाद कोर्ट रूम में मौजूद लोगों के बीच हल्की मुस्कान भी देखने को मिली। दरअसल, याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया था कि सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह प्याज और लहसुन के सेवन से मानव स्वास्थ्य और सामाजिक व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन कराए। याचिका में दावा किया गया था कि इन खाद्य पदार्थों के सेवन से कई तरह के व्यवहारिक और मानसिक बदलाव हो सकते हैं, इसलिए इस पर राष्ट्रीय स्तर पर शोध कराया जाना चाहिए। इस दलील को सुनते ही CJI ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का समय बेहद कीमती है और इस तरह की याचिकाएं अदालत के कीमती समय की बर्बादी करती हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत का काम ऐसे मुद्दों पर निर्देश देना नहीं है, जिनका कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अगर हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं या धारणाओं के आधार पर याचिका दायर करने लगेगा, तो अदालत के सामने गंभीर मामलों की सुनवाई प्रभावित हो जाएगी। उन्होंने वकील से पूछा कि क्या उन्होंने याचिका दाखिल करने से पहले इस विषय पर कोई ठोस वैज्ञानिक या कानूनी आधार प्रस्तुत किया है। कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता की ओर से सफाई देने की कोशिश की गई, लेकिन अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि इस तरह के मुद्दों को न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि अगर इस तरह की याचिकाएं लगातार दाखिल की जाती रहीं, तो अदालत को सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि सार्वजनिक हित याचिका (PIL) का इस्तेमाल केवल गंभीर और जनहित से जुड़े मामलों के लिए ही होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार यह कह चुका है कि पीआईएल का दुरुपयोग रोकना जरूरी है, ताकि न्यायपालिका का समय और संसाधन सही मामलों में उपयोग हो सके।



