एथनॉल सेक्टर पर संकट, ज्यादा क्षमता और कम मांग

भारत का एथनॉल सेक्टर एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ने के बावजूद मांग उसी गति से नहीं बढ़ रही है। CareEdge Ratings के अनुसार देश की एथनॉल उत्पादन क्षमता करीब 2000 करोड़ लीटर तक पहुंच चुकी है और FY27 तक इसमें लगभग 400 करोड़ लीटर की अतिरिक्त क्षमता जुड़ने की उम्मीद है। इसके मुकाबले E20 ब्लेंडिंग के तहत मांग करीब 1100 करोड़ लीटर है।
इस अंतर का सीधा असर एथनॉल प्लांट्स की क्षमता उपयोग पर पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक तेल विपणन कंपनियों को उपलब्ध कराए गए एथनॉल में से केवल करीब 60 प्रतिशत ही खरीदा जा रहा है। इससे कई डिस्टिलरी अपनी पूरी क्षमता पर उत्पादन नहीं कर पा रही हैं और नई परियोजनाओं में निवेश की रफ्तार भी प्रभावित हो रही है।
एथनॉल उद्योग में पिछले कुछ वर्षों में क्षमता विस्तार को सरकारी नीतियों, E20 लक्ष्य, वित्तीय प्रोत्साहन और तेल कंपनियों के ऑफटेक समझौतों से बढ़ावा मिला। भारत ने दिसंबर 2025 में पेट्रोल में औसत 20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लिया था, लेकिन अब आगे की चुनौती बढ़ी हुई क्षमता के लिए पर्याप्त मांग तैयार करना है।
इस संकट का असर उन कंपनियों पर ज्यादा पड़ सकता है, जिन्होंने प्लांट स्थापित करने के लिए बैंक से बड़ा कर्ज लिया है। यदि उत्पादन क्षमता का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं होता और बिक्री सीमित रहती है तो कंपनियों के नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में ब्याज और कर्ज की किस्तों का भुगतान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
क्षेत्रीय स्तर पर भी एथनॉल क्षमता और मांग में असंतुलन दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में क्षमता अधिशेष की स्थिति है, जबकि कुछ अन्य राज्यों में मांग के मुकाबले उत्पादन क्षमता कम है। इससे एथनॉल को लंबी दूरी तक पहुंचाने की लागत बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। अधिक एथनॉल मिश्रण के लिए फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों, स्टोरेज टैंक, परिवहन नेटवर्क, रिटेल आउटलेट और ब्लेंडिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार भी जरूरी है। इन क्षेत्रों में धीमी प्रगति मांग को तेजी से बढ़ने से रोक सकती है।
फिलहाल उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती अतिरिक्त क्षमता को खपाने की है। यदि E25, E85 जैसे उच्च ब्लेंडिंग स्तर और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का विस्तार तेजी से होता है तो अतिरिक्त क्षमता का उपयोग बढ़ सकता है। लेकिन मांग में अपेक्षित तेजी नहीं आई तो अगले कुछ वर्षों तक एथनॉल उद्योग में कम क्षमता उपयोग, कमजोर मार्जिन और कर्ज का दबाव बना रहने की आशंका है।



