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ISRO EOS-05 Launch: 36 हजार किमी ऊपर से भारत पर नजर, रचा इतिहास

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 4 सितंबर 2026 को EOS-05 उपग्रह का सफल प्रक्षेपण कर बड़ी उपलब्धि हासिल की। GSLV-F17 रॉकेट के जरिए श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 2:55 बजे उपग्रह को लॉन्च किया गया। प्रक्षेपण के करीब 18 मिनट बाद EOS-05 को निर्धारित सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया।

EOS-05 की सबसे बड़ी खासियत इसकी जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से पृथ्वी की निगरानी करने की क्षमता है। अंतिम परिचालन कक्षा में पहुंचने के बाद यह उपग्रह करीब 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई से पृथ्वी के एक ही क्षेत्र पर लगातार नजर रखने में सक्षम होगा। इससे सामान्य पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों की तुलना में किसी क्षेत्र की अधिक बार और नियमित तस्वीरें हासिल की जा सकेंगी।

इस मिशन के लिए GSLV-F17 रॉकेट का इस्तेमाल किया गया, जिसे पहले अपनी कुछ असफलताओं के कारण अनौपचारिक तौर पर ‘नॉटी बॉय’ कहा जाता रहा है। EOS-05 का सफल प्रक्षेपण ऐसे समय हुआ है जब ISRO के लिए मिशन की विश्वसनीयता को मजबूत करना भी महत्वपूर्ण था।

लगभग 2,367 किलोग्राम वजनी EOS-05 अब भारत की पृथ्वी निगरानी क्षमता को नई ऊंचाई देने वाला है। यह उपग्रह मौसम, प्राकृतिक आपदाओं, कृषि, पर्यावरण और रणनीतिक क्षेत्रों की निगरानी में उपयोगी डेटा उपलब्ध करा सकता है।

कृषि क्षेत्र में उपग्रह से मिलने वाली हाई-फ्रीक्वेंसी इमेजिंग का इस्तेमाल फसलों और जमीन की स्थिति पर नजर रखने में किया जा सकता है। नियमित अंतराल पर एक ही क्षेत्र की तस्वीरें मिलने से खेती से जुड़े बदलावों की निगरानी और आकलन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी EOS-05 की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और अन्य आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों की लगातार निगरानी से प्रशासन को स्थिति का आकलन करने और राहत-बचाव की योजना बनाने में सहायता मिल सकती है।

मौसम निगरानी के क्षेत्र में भी इस मिशन से उम्मीदें जुड़ी हैं। किसी बड़े क्षेत्र की लगातार इमेजिंग से बादलों, मौसम प्रणालियों और पर्यावरणीय बदलावों पर नजर रखने के लिए उपयोगी डेटा मिल सकता है।

EOS-05 की क्षमता का रणनीतिक महत्व भी काफी बड़ा है। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से किसी निश्चित क्षेत्र की लगातार निगरानी संभव होने के कारण सीमा और संवेदनशील क्षेत्रों पर नजर रखने की क्षमता मजबूत हो सकती है। हालांकि, उपग्रह का उपयोग नागरिक और रणनीतिक दोनों क्षेत्रों में किया जा सकता है।

इस मिशन की एक और खास बात यह है कि EOS-05 को सीधे अंतिम जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में नहीं, बल्कि पहले सब-जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया है। इसके बाद उपग्रह अपने ऑनबोर्ड थ्रस्टर्स की मदद से अंतिम परिचालन कक्षा तक पहुंचेगा।

ISRO की यह उपलब्धि भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता को दर्शाती है। EOS-05 के सफल प्रक्षेपण से पृथ्वी अवलोकन, आपदा प्रबंधन, कृषि निगरानी और रणनीतिक जरूरतों के लिए भारत के पास एक नया और शक्तिशाली अंतरिक्ष संसाधन जुड़ गया है।

कुल मिलाकर EOS-05 मिशन भारत के लिए सिर्फ एक और सैटेलाइट लॉन्च नहीं, बल्कि जियोसिंक्रोनस कक्षा से पृथ्वी की निरंतर निगरानी की दिशा में महत्वपूर्ण तकनीकी कदम है। इसकी परिचालन क्षमता पूरी तरह सक्रिय होने के बाद इससे मिलने वाला डेटा कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत की निगरानी और निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत कर सकता है।

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