
देश में महिला सशक्तिकरण और नारी शक्ति को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन चुनावी राजनीति के आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। विभिन्न चुनावों में महिलाओं को दिए जाने वाले टिकटों का प्रतिशत अभी भी काफी कम बना हुआ है। कई मौकों पर राजनीतिक दलों ने कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत तक ही सीमित रखी है, जिससे राजनीति में उनकी वास्तविक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि टिकट वितरण में उन्हें अधिक अवसर देना भी आवश्यक है। स्थानीय निकायों से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों तक महिलाओं की सक्रिय भागीदारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक समावेशी और संतुलित बना सकती है। इसके बावजूद कई दल सुरक्षित या जीतने योग्य सीटों पर महिला उम्मीदवारों को मौका देने से अब भी हिचकिचाते दिखाई देते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक भागीदारी में वृद्धि के बावजूद राजनीति में उनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। महिला आरक्षण और प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव अभी भी सीमित दिखाई देता है। ऐसे में महिलाओं को अधिक राजनीतिक अवसर देने और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ाने की मांग लगातार उठती रही है।



