अब हर पायलट का साल में एक बार होगा ड्रग टेस्ट?

देश में विमानन सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए पायलटों के ड्रग टेस्ट नियमों में बदलाव की तैयारी चल रही है। नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू ने बताया कि DGCA सभी पायलटों का साल में कम से कम एक बार रैंडम ड्रग टेस्ट कराने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। अभी नियमों के तहत पूरे पायलट नेटवर्क के करीब 10 प्रतिशत सदस्यों की सालाना रैंडम जांच की जाती है।
प्रस्तावित व्यवस्था लागू होने पर हर पायलट को वर्ष में कम से कम एक बार अचानक या रैंडम तरीके से ड्रग टेस्ट से गुजरना पड़ सकता है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उड़ान संचालन में शामिल पायलट किसी ऐसे पदार्थ के प्रभाव में न हों, जिससे उनकी कार्यक्षमता या विमान की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
नागरिक उड्डयन मंत्रालय और DGCA इस प्रस्ताव के व्यावहारिक पहलुओं पर एयरलाइंस और अन्य संबंधित पक्षों से चर्चा कर रहे हैं। सरकार के सामने एक ओर यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, वहीं दूसरी ओर पूरे पायलट नेटवर्क की जांच कराने से होने वाले परिचालन संबंधी प्रभावों का भी आकलन किया जा रहा है।
यह चर्चा ऐसे समय हो रही है जब 4 अगस्त को एयर इंडिया की फुकेत-दिल्ली उड़ान में अचानक करीब 300 फीट की ऊंचाई कम होने की घटना हुई थी। इस घटना के बाद दोनों पायलटों का साइकोएक्टिव सब्सटेंस टेस्ट कराया गया था और कप्तान की पुष्टि जांच में मारिजुआना के लिए रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस टेस्ट के नतीजे को विमान की ऊंचाई कम होने की घटना का कारण अभी स्थापित नहीं किया गया है और मामले की जांच जारी है।
सरकार का मानना है कि नियमित और रैंडम जांच से विमानन क्षेत्र में सुरक्षा मानकों को और मजबूत किया जा सकता है। अगर 100 प्रतिशत सालाना टेस्टिंग का प्रस्ताव लागू होता है, तो भारत में पायलटों की ऐसी व्यापक जांच व्यवस्था लागू करने वाला एक अग्रणी देश बन सकता है।
फिलहाल 100 प्रतिशत सालाना ड्रग टेस्ट का नियम लागू नहीं हुआ है। DGCA प्रस्ताव की व्यवहारिकता और एयरलाइंस पर पड़ने वाले परिचालन प्रभावों का मूल्यांकन कर रहा है। अंतिम निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सभी पायलटों के लिए साल में एक बार रैंडम ड्रग टेस्ट अनिवार्य किया जाएगा या मौजूदा व्यवस्था में कोई अन्य बदलाव किया जाएगा।



