
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के पक्ष में अजरबैजान के रुख ने भारत में काफी चर्चा और नाराजगी पैदा की थी। इस घटनाक्रम का असर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ा। भारत और अजरबैजान के बीच पहले से मौजूद कारोबारी और कूटनीतिक रिश्तों में कुछ समय के लिए तनाव देखने को मिला।
अब परिस्थितियां बदलती नजर आ रही हैं। भारत और अजरबैजान के अधिकारियों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत दोबारा शुरू हुई है। यह संकेत माना जा रहा है कि दोनों देश पुराने मतभेदों को पीछे छोड़कर संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।
दोनों देशों के बीच बातचीत में व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसके अलावा सीमा पार आतंकवाद से निपटने में सहयोग पर भी चर्चा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे में आने वाले समय में भारत-अजरबैजान संबंधों में व्यावहारिक सहयोग बढ़ सकता है।
अजरबैजान के पाकिस्तान के साथ करीबी रणनीतिक संबंध रहे हैं, जबकि भारत के अर्मेनिया के साथ भी महत्वपूर्ण रिश्ते हैं। इसी वजह से भारत और अजरबैजान के बीच क्षेत्रीय और रणनीतिक हितों को लेकर मतभेद पैदा हुए। इसके बावजूद दोनों देशों के आर्थिक और कूटनीतिक हित उन्हें संवाद बनाए रखने की ओर ले जा सकते हैं।
सवाल यही है कि क्या अजरबैजान भविष्य में भारत के साथ पहले की तरह मजबूत संबंध बनाने की दिशा में आगे बढ़ेगा। मौजूदा कूटनीतिक गतिविधियों से इतना जरूर संकेत मिलता है कि दोनों देश मतभेदों को बातचीत के जरिए कम करने के इच्छुक हैं। हालांकि इसे किसी बड़े रणनीतिक बदलाव के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी।
भारत के लिए भी अजरबैजान के साथ संबंधों का आर्थिक और रणनीतिक महत्व है। मध्य एशिया और उससे जुड़े क्षेत्र में कनेक्टिविटी, ऊर्जा और व्यापार के लिहाज से अजरबैजान उपयोगी साझेदार हो सकता है। इसलिए दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार भारत की व्यापक विदेश नीति के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
फिलहाल भारत-अजरबैजान संबंधों का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश पुराने मतभेदों को किस तरह संभालते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पैदा हुई दूरी के बावजूद बातचीत की वापसी एक सकारात्मक संकेत है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह संवाद सिर्फ कूटनीतिक पहल तक सीमित रहता है या दोनों देशों के रिश्तों में वास्तविक मजबूती आती है।



