भारत खरीदेगा जैवलिन मिसाइल, जानें क्यों खास है अमेरिकी हथियार

भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम सामने आया है। भारत ने अमेरिका से जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम खरीदने का समझौता किया है। अमेरिकी दूतावास की ओर से इसकी जानकारी साझा की गई है। यह सौदा भारतीय सेना की एंटी-आर्मर क्षमता को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
जैवलिन एक पोर्टेबल और कंधे से दागी जाने वाली एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल प्रणाली है। इसे अमेरिकी रक्षा कंपनियों Lockheed Martin और RTX ने विकसित किया है। इसका डिजाइन इस तरह किया गया है कि पैदल सैनिक भी इसे इस्तेमाल कर बख्तरबंद वाहनों और टैंकों को निशाना बना सकें।
इस हथियार की सबसे बड़ी खासियत इसकी फायर-एंड-फॉरगेट तकनीक है। मिसाइल दागे जाने के बाद सिस्टम लक्ष्य को खुद ट्रैक करता है। इससे ऑपरेटर को मिसाइल के लक्ष्य तक पहुंचने तक लगातार उसे निर्देशित करने की जरूरत नहीं होती और वह तुरंत सुरक्षित स्थान बदल सकता है।
जैवलिन में इमेजिंग इंफ्रारेड सीकर का इस्तेमाल किया जाता है। यह तकनीक मिसाइल को लक्ष्य की पहचान और ट्रैकिंग में मदद करती है। सिस्टम में टॉप-अटैक और डायरेक्ट-फायर जैसे विकल्प भी मौजूद हैं, जिससे अलग-अलग परिस्थितियों में बख्तरबंद लक्ष्यों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
टॉप-अटैक क्षमता जैवलिन की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। इस मोड में मिसाइल लक्ष्य के ऊपर से हमला कर सकती है, जिससे टैंक के अपेक्षाकृत कमजोर ऊपरी हिस्से को निशाना बनाया जाता है। जरूरत पड़ने पर डायरेक्ट-फायर मोड का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
जैवलिन को युद्ध में परखा जा चुका है और यह अमेरिका तथा उसके सहयोगी देशों की सेनाओं में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहा है। इसकी पोर्टेबिलिटी और सटीकता इसे पैदल सेना के लिए उपयोगी एंटी-टैंक हथियार बनाती है।
अमेरिकी सरकार के एक पूर्व बिक्री प्रस्ताव में भारत के लिए 100 Javelin rounds, एक fly-to-buy missile और 25 Lightweight Command Launch Units का उल्लेख किया गया था। प्रस्तावित पैकेज में प्रशिक्षण, स्पेयर पार्ट्स, तकनीकी सहायता और अन्य लॉजिस्टिक सपोर्ट भी शामिल थे। इसकी अनुमानित कीमत 45.7 मिलियन डॉलर बताई गई थी।
इस मिसाइल प्रणाली की एक और खासियत इसका अपेक्षाकृत मोबाइल डिजाइन है। पूरा सिस्टम पैदल सैनिकों द्वारा ले जाने और संचालित करने के लिए बनाया गया है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक मिसाइल का वजन करीब 11.8 किलोग्राम है, जबकि कमांड लॉन्च यूनिट का वजन लगभग 7 किलोग्राम है।
भारत के लिए जैवलिन की खरीद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सेना को आधुनिक और पोर्टेबल एंटी-टैंक क्षमता मिलेगी। पहाड़ी और कठिन भूभाग वाले इलाकों में ऐसी प्रणालियां बख्तरबंद खतरों से निपटने में उपयोगी हो सकती हैं।
यह सौदा भारत-अमेरिका के बढ़ते रक्षा संबंधों को भी दर्शाता है। दोनों देश पिछले कुछ वर्षों में सैन्य उपकरण, तकनीक और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्रों में साझेदारी बढ़ा रहे हैं। जैवलिन सौदा इस सहयोग को और आगे ले जाने वाला कदम माना जा रहा है।
जैवलिन की खरीद के साथ भारत की कोशिश अपनी सैन्य क्षमताओं में विविधता लाने की भी है। आधुनिक युद्ध में टैंक और अन्य बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ सटीक, मोबाइल और कम समय में तैनात होने वाले हथियारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
कुल मिलाकर जैवलिन एंटी-टैंक सिस्टम की फायर-एंड-फॉरगेट क्षमता, इंफ्रारेड सीकर, टॉप-अटैक मोड और पोर्टेबल डिजाइन इसे भारतीय सेना के लिए उपयोगी हथियार बना सकते हैं। अमेरिका के साथ यह रक्षा सौदा भारत की एंटी-आर्मर क्षमता और दोनों देशों के रणनीतिक रक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।



