नीम करोली बाबा कौन थे? क्यों कहलाते हैं हनुमान अंश

नीम करोली बाबा का वास्तविक नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। उनका जीवन आध्यात्मिक साधना और सेवा से जुड़ा रहा। उत्तराखंड का कैंची धाम आज उनकी सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक धरोहरों में से एक है। बाबा ने वर्ष 1964 में कैंची में आश्रम की स्थापना की, जहां हनुमान जी का मंदिर भी स्थापित किया गया।
नीम करोली बाबा को भगवान हनुमान का परम भक्त माना जाता है। इसी वजह से उनके अनुयायियों के बीच उन्हें हनुमान जी का अंश या हनुमान स्वरूप मानने की धार्मिक मान्यता प्रचलित हुई। हालांकि, इसे भक्तों की आस्था और आध्यात्मिक विश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए। उनके जीवन से जुड़ी कई कथाओं में उनकी आध्यात्मिक शक्ति और चमत्कारी अनुभवों का वर्णन मिलता है।
बाबा की शिक्षाओं का मुख्य आधार प्रेम, सेवा और स्मरण माना जाता है। कैंची धाम के आधिकारिक आश्रम स्रोत में भी “Love. Serve. Remember” को प्रमुख संदेश के रूप में रखा गया है।
कैंची धाम उत्तराखंड के नैनीताल जिले के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित है। यह स्थान आज देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। हर वर्ष 15 जून को यहां स्थापना दिवस के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
नीम करोली बाबा का प्रभाव भारत तक सीमित नहीं रहा। उनके कई विदेशी शिष्य भी रहे, जिनमें राम दास, भगवान दास, कृष्ण दास और अन्य लोग शामिल हैं। इसी कारण बाबा की शिक्षाएं भारत के बाहर भी प्रसिद्ध हुईं।
बाबा के जीवन से जुड़ी चमत्कारी कथाएं आज भी भक्तों के बीच सुनाई जाती हैं। इन कथाओं को श्रद्धालु उनकी आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ते हैं, जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से इनके सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि करना संभव नहीं है। यही वजह है कि नीम करोली बाबा की कहानी में इतिहास, आध्यात्मिकता और भक्तों की आस्था तीनों पहलू दिखाई देते हैं।
11 सितंबर 1973 को नीम करोली बाबा ने वृंदावन में देह त्याग किया। उनके निधन के बाद भी उनकी आध्यात्मिक विरासत कैंची धाम समेत कई आश्रमों और उनके अनुयायियों के माध्यम से आगे बढ़ती रही।
आज भी कैंची धाम में आने वाले श्रद्धालु बाबा की शिक्षाओं और हनुमान भक्ति से प्रेरणा लेते हैं। नीम करोली बाबा का जीवन इस बात पर जोर देता है कि आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि दूसरों की सेवा और प्रेम से भी जुड़ी है।



