Holi 2026: टेसू के फूलों से रंग खेलने की परंपरा क्यों है खास? जानें धार्मिक और वैज्ञानिक कारण

रंगों का त्योहार होली भारत की सबसे जीवंत और उल्लासपूर्ण परंपराओं में से एक है। Holi के अवसर पर रंगों से खेलने की परंपरा सदियों पुरानी है, लेकिन पुराने समय में लोग केमिकल रंगों की जगह प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते थे। इन्हीं प्राकृतिक रंगों में सबसे खास माने जाते हैं टेसू के फूल, जिन्हें पलाश भी कहा जाता है। आयुर्वेद और लोक परंपराओं में टेसू के फूलों को शुद्ध, औषधीय और शुभ माना गया है।
टेसू का पेड़, जिसे वैज्ञानिक रूप से Butea monosperma कहा जाता है, वसंत ऋतु में चमकीले नारंगी-लाल फूलों से लद जाता है। इन फूलों को सुखाकर या पानी में भिगोकर प्राकृतिक रंग तैयार किया जाता था। माना जाता है कि यह रंग त्वचा के लिए लाभकारी होता है और इसमें एंटीसेप्टिक गुण भी पाए जाते हैं। यही कारण है कि प्राचीन समय में होली पर टेसू के रंगों से स्नान करना स्वास्थ्यवर्धक माना जाता था।
धार्मिक दृष्टि से भी टेसू का संबंध वसंत और नवजीवन से जोड़ा जाता है। वसंत पंचमी से लेकर होली तक प्रकृति में जो परिवर्तन आता है, टेसू के फूल उसका प्रतीक माने जाते हैं। ग्रामीण भारत में आज भी कई स्थानों पर होली से पहले महिलाएं और बच्चे टेसू के फूल इकट्ठा कर रंग तैयार करते हैं। यह न केवल पर्यावरण के अनुकूल परंपरा है, बल्कि सामूहिक सहभागिता और उत्साह का भी प्रतीक है।
आधुनिक समय में रासायनिक रंगों के दुष्प्रभाव सामने आने के बाद एक बार फिर प्राकृतिक रंगों की ओर लौटने की मुहिम तेज हुई है। Holi 2026 के अवसर पर भी लोग इको-फ्रेंडली होली मनाने का संकल्प ले रहे हैं। टेसू के फूलों की परंपरा हमें यह संदेश देती है कि त्योहार केवल आनंद का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन और स्वास्थ्य की रक्षा का भी अवसर है।



