कन्या पूजन में लंगूर क्यों जरूरी है? जानें 2026 में इस परंपरा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

नवरात्रि और कन्या पूजन हिंदू धर्म की एक अत्यंत महत्वपूर्ण परंपरा मानी जाती है। इसमें नौ कन्याओं को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें भोजन, उपहार तथा सम्मान दिया जाता है। लेकिन कई स्थानों पर इस पूजा में “लंगूर” को भी शामिल किया जाता है, जिसे लेकर लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि आखिर कन्या पूजन में लंगूर का होना क्यों जरूरी माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंगूर को भगवान हनुमान का प्रतीक माना जाता है। कुछ परंपराओं में कन्या पूजन के साथ एक बालक को “लंगूर” के रूप में बैठाकर उसकी भी पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि देवी पूजा तभी पूर्ण होती है जब शक्ति (कन्या रूप) के साथ भक्ति और सेवा (हनुमान स्वरूप लंगूर) का भी सम्मान किया जाए। यह परंपरा शक्ति और भक्ति के संतुलन को दर्शाती है।
कई क्षेत्रों में यह भी मान्यता है कि लंगूर को भोजन कराना और उसका आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सुख-समृद्धि का वास होता है। इसलिए कन्या पूजन के दौरान कन्याओं के साथ-साथ लंगूर को भी विशेष महत्व दिया जाता है।
हालांकि, यह परंपरा हर जगह एक जैसी नहीं है। कुछ स्थानों पर केवल कन्या पूजन ही किया जाता है, जबकि कुछ जगहों पर कन्याओं के साथ एक या दो बालकों को लंगूर के रूप में पूजा जाता है। यह पूरी तरह स्थानीय रीति-रिवाजों और मान्यताओं पर निर्भर करता है।
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि कन्या पूजन का मुख्य उद्देश्य नारी शक्ति का सम्मान करना है। लंगूर की परंपरा केवल एक सांकेतिक विस्तार है, जो भक्ति और सेवा भाव को जोड़ती है। इसलिए इसे अनिवार्य नहीं बल्कि पारंपरिक मान्यता के रूप में देखा जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, कन्या पूजन में लंगूर की भूमिका धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा है। इसका उद्देश्य देवी स्वरूप कन्याओं के साथ-साथ भक्ति और सेवा के प्रतीक का सम्मान करना है, जिससे पूजा का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।



