तुष्टिकरण और गर्त में ले जाएगा कांग्रेस को
- *बृज लाल* (पूर्व पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश एवं सांसद, राज्यसभा)

राजनीतिक गलियारों में इन दिनों बयानों के तीर तीखे होते जा रहे हैं, लेकिन जब ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोग देश में अराजकता की तुलना पड़ोसी देशों से करने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। ठगी की राजधानी जामताड़ा से विधायक झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी का हालिया बयान इसी कड़ी का एक चिंताजनक अध्याय है। डॉ. अंसारी ने दावा किया कि देश में 40 लाख युवा तैयार बैठे हैं और वे राजीव गांधी के पुत्र राहुल गांधी के एक इशारे का इंतज़ार कर रहे हैं। इशारा मिलते ही भारत में नेपाल और बांग्लादेश जैसे हालात पैदा कर दिए जाएंगे।
सवाल यह उठता है कि डॉ. अंसारी किसे बेवकूफ बना रहे हैं? चरमपंथी और कट्टरपंथी मानसिकता वाले नेताओं के ऐसे ही बयानों और नीतियों ने कांग्रेस पार्टी को राजनीतिक रसातल में धकेलने का काम किया है। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद उमड़ी सहानुभूति की लहर में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 414 सीटों का प्रचंड बहुमत मिला था। लेकिन इसके तुरंत बाद पार्टी ने तुष्टिकरण की राजनीति की राह पकड़ ली। अप्रैल 1985 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने एक तलाक पीड़िता बुजुर्ग मुस्लिम महिला शाहबानो के पक्ष में गुजारा भत्ता देने का ऐतिहासिक निर्णय सुनाया, तो कट्टरपंथियों के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संविधान में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही पलट दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के पतन की वास्तविक शुरुआत यहीं से हुई, जो आज तक लगातार जारी है।
तुष्टिकरण के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस सरकार ने वर्ष 1995 में ‘वक्फ संशोधन अधिनियम’ पारित किया। इसके तहत वक्फ बोर्ड और उसके ट्रिब्यूनल को असीमित शक्तियां दे दी गईं। इसके दुष्परिणामस्वरूप आम नागरिकों, हिंदुओं, आदिवासियों, ईसाइयों और सिखों की जमीनों के साथ-साथ सरकारी संपत्तियों पर भी बेहिसाब दावों व कब्जों का दौर शुरू हो गया। इस कानून की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि पीड़ित पक्ष को जिला स्तरीय अधिकारियों या अदालतों से न्याय मांगने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। उन्हें केवल वक्फ ट्रिब्यूनल या उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की छूट दी गई। जिस गरीब ग्रामीण ने कभी थाने, तहसील या जिलाधिकारी दफ्तर का मुंह नहीं देखा था, वह हाईकोर्ट के चक्कर लगाने में असमर्थ होकर अपनी ज़मीनों को छिनता देखने के लिए मजबूर हो गया।
इसके बावजूद राजनीति थमी नहीं। वर्ष 2013 में कांग्रेस ने वक्फ एक्ट में पुनः संशोधन करके वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकारों को और अधिक बढ़ा दिया। इसी दौरान दिल्ली की 123 बहुमूल्य संपत्तियां और ज़मीनें वक्फ के सुपुर्द कर दी गईं। तुष्टिकरण की इस राजनीति का सीधा परिणाम चुनावी नतीजों में देखने को मिला। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल 44 सीटें मिलीं, 2019 में 52 सीटें और 2024 में 99 सीटें। गौरतलब है कि इन तीनों लोकसभा चुनावों में मिलाकर भी कांग्रेस की कुल सीटें (195) बहुमत के जादुई आंकड़े (272) तक नहीं पहुंच पाती हैं।
56 वर्षीय राहुल गांधी को बार-बार ‘री-लॉन्च’ करने के प्रयास विफल रहे हैं। जब लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए सत्ता में वापसी के रास्ते बंद दिखने लगे, तो अब संवैधानिक संस्थाओं पर निशाना साधा जाने लगा है। चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की साख पर सवाल उठाकर हिंसक आंदोलनों की रूपरेखा बनाई जा रही है, लेकिन इसका नतीजा भी शून्य ही रहा है। कांग्रेस नेताओं को इतिहास और आंकड़ों का अध्ययन करने की आवश्यकता है। वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति फरवरी 2024 में हुई, जबकि कांग्रेस उससे वर्षों पहले से लगातार चुनाव हारती आ रही है। आज तेलंगाना, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश को छोड़ दें तो देश के किसी बड़े राज्य में कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में नहीं है। कई राज्यों में वह क्षेत्रीय दलों की बैसाखी पर ‘छोटे भाई’ की भूमिका निभा रही है और ‘इंडी’ गठबंधन भी बिखराव के कगार पर है।
लोकतंत्र में सत्ता का मार्ग सड़कों पर हिंसा या नेपाल-बांग्लादेश जैसी अराजकता पैदा करने से नहीं, बल्कि देशवासियों का दिल और विश्वास जीतने से प्रशस्त होता है। तुष्टिकरण और हिंसक आंदोलनों की राजनीति कांग्रेस और राहुल गांधी को और अधिक गर्त में ले जाएगी। समय आ गया है कि पार्टी जमीनी हकीकत को स्वीकार करे और रचनात्मक राजनीति की राह चुने।



