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वाराणसी में संगीत कला के प्रतिनिधि परिवारों से मिलने पहुंची प्रियंका गांधी, कबीरमठ में संत कबीर के माता-पिता की समाधि के किए दर्शन

प्रियंका गांधी इन दिनों बनारस में हैं. वह कबीरचौरा-स्थित विलक्षण संत कवि कबीर की मूलगादी में ही रुकी हुई हैं. आज सुबह उन्होंने बिल्कुल सादा और अनौपचारिक शिल्प में कबीरमठ-स्थित कबीर के माता-पिता, नीरू-नीमा की समाधि का दर्शन-अवलोकन किया और मठ में स्थित कबीर के बचपन और उनके व्यवसाय से जुड़ी पुरानी सामग्रियों को भी देखा. कबीर चौरा संगीत का वैश्विक केंद्र है. उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की तीन प्रमुख विधाओं – क्लासिकल गायकी, कथक नृत्य और तबले की सिद्धपीठ भी है. कबीरचौरा की संकरी जनाकीर्ण गलियों से होते हुए प्रियंका अपने चुनिंदा सहयोगियों के साथ गायन, वादन और नृत्य के तीनों अंगों के तीन प्रतिनिधि परिवारों तक पहुंची.

प्रियंका गांधी पद्मविभूषण दिवंगत पंडित किशन महाराज के यशस्वी बेटे पंडित पूरन महाराज और उनके शिष्यों और परिचितों से मिलीं और कुछ देर तक तबले के बोल सुनती रहीं. जानकारी के अनुसार इस मठ में साल 1934 में महात्मा गांधी आ चुके हैं. इसके अलावा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रकवि रविंद्रनाथ टैगोर भी यहां आकर रुका करते थे. ऐसे में अभी सातवें चरण में सात मार्च को वोट पड़ना है. इन चरण में अति पिछड़ी जातियों व दलितों की संख्या काफी ठीकठाक है.

क्या हैं कबीरमठ के मायने?

माना जा रहा है कि कहा वाराणसी में कबीर चौरा मठ को अपना ठिकाना बनाकर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने एक बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है. संत कबीर दास जी के सामाजिक न्याय एवं समानता के संदेश से यूपी का दलित एवं अति पिछड़ा वर्ग बहुत जुड़ाव रखता है. जहां यूपी के सांतवें फ़ेज में चुनाव होना (पूर्वांचल) है, उन जगहों पर अति पिछड़ी जातियों और दलितों की संख्या अच्छी-ख़ासी है. साथ ही संत कबीरदास जी का सांस्कृतिक महत्व भी बहुत है. ऐसे में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने दलित व अति पिछड़े वर्ग के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाई है. उन्होंने अपने घोषणा पत्र में भी दलित व अति पिछड़े वर्ग के लिए काफ़ी दूरगामी परिणामों वाली घोषणाएं की हैं. कबीर चौरा मठ का ठिकाना प्रियंका के संघर्षों और सामाजिक न्याय को मज़बूत करने के उनके प्रयासों को लेकर एक बड़ा संदेश देगा.

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