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सऊदी अरब में 2025 में 356 लोगों को फांसी, बना रिकॉर्ड

सऊदी अरब में मृत्युदंड के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, वर्ष 2025 में देश में कम से कम 356 लोगों को फांसी दी गई। यह निगरानी शुरू होने के बाद एक साल में दर्ज की गई सबसे अधिक संख्या है। इससे पहले 2024 में 345 लोगों को मृत्युदंड दिया गया था। लगातार दूसरे साल आंकड़ा बढ़ने के बाद सऊदी अरब की मृत्युदंड नीति पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।

औसतन हर दिन एक व्यक्ति को मृत्युदंड

2025 में 356 लोगों को मृत्युदंड दिए जाने का मतलब है कि पूरे साल के औसत के हिसाब से लगभग हर दिन एक व्यक्ति को फांसी दी गई। यह आंकड़ा सऊदी अरब में मृत्युदंड के व्यापक इस्तेमाल को दर्शाता है। मानवाधिकार संगठनों ने विशेष रूप से उन मामलों पर चिंता जताई है, जिनमें हत्या जैसे गंभीर हिंसक अपराधों के बजाय नशीले पदार्थों से जुड़े अपराधों के लिए मौत की सजा दी गई।

ड्रग्स से जुड़े मामलों में सबसे ज्यादा सजाएं

ह्यूमन राइट्स वॉच ने Reprieve और यूरोपियन सऊदी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2025 में 240 लोगों को ड्रग्स से संबंधित अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया गया। इनमें 188 विदेशी नागरिक थे। रिपोर्ट के अनुसार, नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों ने सऊदी अरब में मृत्युदंड की कुल संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विदेशी नागरिकों पर भी लागू हुई मौत की सजा

सऊदी अरब में मृत्युदंड पाने वालों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की रही। मानवाधिकार संगठनों ने ऐसे मामलों में निष्पक्ष सुनवाई, पर्याप्त कानूनी सहायता और आरोपियों को अपनी भाषा में कानूनी प्रक्रिया समझने का अवसर मिलने को लेकर चिंता जताई है। विदेश से काम करने या रहने आए लोगों के लिए किसी दूसरे देश की न्यायिक व्यवस्था में कानूनी सहायता प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और आरोपों तथा न्यायिक फैसलों का मूल्यांकन मामले के आधार पर किया जाना चाहिए।

नाबालिग रहते किए गए कथित अपराधों पर भी चिंता

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कम से कम दो ऐसे लोगों को मृत्युदंड दिए जाने पर चिंता जताई, जिन्हें नाबालिग रहते हुए किए गए कथित अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार, अपराध के समय 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्तियों को किए गए अपराधों के लिए मृत्युदंड नहीं दिया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में उम्र, मुकदमे की प्रक्रिया और आरोपियों को मिले कानूनी संरक्षण जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

पत्रकार को मृत्युदंड दिए जाने का मामला

सऊदी अरब में पत्रकार तुर्की अल-जासर को 2025 में मृत्युदंड दिए जाने का मामला भी चर्चा में रहा। मानवाधिकार संगठनों ने इस मामले पर चिंता जताई और आरोप लगाया कि उनके खिलाफ कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल खड़े करती है। हालांकि, किसी मामले के पीछे की वजह और आरोपों की प्रकृति समझने के लिए आधिकारिक आरोपों, न्यायिक दस्तावेजों और स्वतंत्र मानवाधिकार रिपोर्टों को अलग-अलग देखना जरूरी है।

मानवाधिकार संगठनों ने उठाए सवाल

ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठनों ने सऊदी अरब में मृत्युदंड के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता जताई है। इन संगठनों का कहना है कि मृत्युदंड के मामलों में निष्पक्ष सुनवाई, कानूनी सहायता और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन सुनिश्चित होना चाहिए। विशेष रूप से गैर-हिंसक ड्रग्स संबंधी अपराधों में मृत्युदंड दिए जाने पर आलोचना की गई है।

दुनिया में भी बढ़े मृत्युदंड के मामले

एमनेस्टी इंटरनेशनल की मई 2026 में जारी वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में दुनिया के 17 देशों में कम से कम 2,707 लोगों को मृत्युदंड दिया गया। यह संगठन द्वारा 1981 के बाद दर्ज किया गया सबसे बड़ा वैश्विक आंकड़ा था। ईरान में सबसे अधिक दर्ज निष्पादन हुए, जबकि सऊदी अरब भी मृत्युदंड देने वाले प्रमुख देशों में शामिल रहा। रिपोर्ट में चीन के आंकड़ों को शामिल नहीं किया गया, क्योंकि वहां निष्पादन संबंधी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

आगे क्या है चुनौती?

सऊदी अरब में मृत्युदंड के बढ़ते आंकड़े न्यायिक प्रक्रिया, अपराधों के लिए निर्धारित सजा और मानवाधिकार संरक्षण को लेकर बहस को तेज करते हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन मृत्युदंड पर रोक लगाने और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं। वहीं, सऊदी अरब की न्यायिक व्यवस्था अपने कानूनों के तहत मामलों पर कार्रवाई करती है। इस मुद्दे पर आगे की चर्चा में देश के कानूनों, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों और प्रत्येक मामले के तथ्यों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।

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