क्या अजरबैजान बन रहा है खालिस्तान समर्थकों का नया मंच?

Azerbaijan को लेकर हाल के महीनों में भारत में नई सुरक्षा और कूटनीतिक चिंताएं सामने आई हैं। कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अजरबैजान में ऐसे सम्मेलन और कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें खालिस्तान समर्थक वक्ताओं और भारत-विरोधी कथनों को मंच मिला।
रिपोर्टों के अनुसार, बाकू स्थित कुछ संगठनों ने ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जिनमें भारत में सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश की गई। आलोचकों का आरोप है कि इन आयोजनों का उपयोग खालिस्तान से जुड़े नैरेटिव को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए किया गया।
इस मुद्दे को अजरबैजान, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। तीनों देशों के बीच रक्षा, कूटनीति और क्षेत्रीय मुद्दों पर सहयोग लगातार बढ़ा है, और उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन किया है।
हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि “अजरबैजान खालिस्तानियों का नया गढ़ बन गया है” जैसी बात अभी व्यापक रूप से स्थापित तथ्य नहीं है। उपलब्ध रिपोर्टें मुख्यतः कुछ आयोजनों, सम्मेलनों और राजनीतिक गतिविधियों पर आधारित हैं। अजरबैजान सरकार ने आधिकारिक रूप से स्वयं को खालिस्तान आंदोलन का समर्थक घोषित नहीं किया है।
भारत और अजरबैजान के संबंध हाल के वर्षों में कई मुद्दों पर तनावपूर्ण रहे हैं, खासकर तब जब अजरबैजान ने कुछ अवसरों पर पाकिस्तान के पक्ष में राजनीतिक समर्थन व्यक्त किया। इसी कारण भारत में अजरबैजान की गतिविधियों पर अधिक बारीकी से नजर रखी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी देश में भारत-विरोधी या अलगाववादी समूहों को सार्वजनिक मंच मिलता है, तो यह नई दिल्ली के लिए सुरक्षा और कूटनीतिक चिंता का विषय बन सकता है। हालांकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक सरकारी बयानों, खुफिया आकलनों और पुष्ट तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है।



