Nepal Flood: भारत ने पहले दिन भेजी मदद, PM बालेन शाह ने संसद में कहा- शुक्रिया

नेपाल इस समय अपनी हाल की सबसे भयावह प्राकृतिक आपदाओं में से एक से जूझ रहा है। हिमालयी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ और फ्लैश फ्लड ने बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान किया है। रिपोर्टों के अनुसार मृतकों की संख्या 1,100 से ऊपर पहुंच चुकी है और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं।
इस मुश्किल घड़ी में भारत ने नेपाल की मदद के लिए तेजी से कदम उठाया। भारत की ओर से आपदा के शुरुआती दौर में ही राहत सामग्री और बचाव दल भेजे गए। इसके बाद भी सहायता की कई खेप नेपाल पहुंचाई गईं। भारतीय वायुसेना के विमानों के जरिए जरूरी सामान और विशेषज्ञ टीमों को नेपाल भेजा गया।
भारत की इस तत्काल मदद की नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने सार्वजनिक रूप से सराहना की है। संसद में बोलते हुए शाह ने भारत और चीन को संकट के समय समय पर सहायता उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने माना कि आपदा के दौरान पड़ोसी देशों की तकनीकी और मानवीय मदद महत्वपूर्ण रही।
बालेन शाह ने खास तौर पर इस बात का उल्लेख किया कि भारत ने राहत और बचाव प्रयासों में तेजी दिखाई। भारतीय विशेषज्ञ दुर्गम इलाकों तक पहुंचे और नुकसान का आकलन करने तथा बचाव अभियान में सहायता की। यह सहयोग ऐसे समय आया जब बाढ़ से सड़क, पुल, बिजली और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएं भी प्रभावित हुई थीं।
भारत की सहायता केवल खाद्य सामग्री तक सीमित नहीं रही। रिपोर्टों के मुताबिक भारत ने कंबल, दवाइयां और सोलर लैंप जैसी जरूरी वस्तुओं के साथ तकनीकी और मेडिकल विशेषज्ञों को भी नेपाल भेजा है। इसके अलावा विशेष सुरंग-बचाव दल को भी उन जगहों पर भेजा गया जहां बाढ़ के बाद हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में लोगों के फंसे होने की आशंका है।
भारतीय टीमों की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाल के कुछ सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके पहाड़ी और दुर्गम हैं। बाढ़ के बाद कई जगहों पर पहुंचना मुश्किल हो गया है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर काम करने वाली विशेषज्ञ टीमें राहत अभियान को गति देने में मदद कर रही हैं।
भारत ने नेपाल में फंसे अपने नागरिकों को निकालने में भी सक्रिय भूमिका निभाई है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, 1 सितंबर तक 163 भारतीय नागरिकों को नेपाल से सुरक्षित निकाला जा चुका था। इसके अलावा भारतीय फॉरेंसिक टीम और विशेष सुरंग बचाव दल भी नेपाल में अभियान में जुटे हुए हैं।
नेपाल के लिए यह आपदा इसलिए और गंभीर है क्योंकि बाढ़ ने केवल जान-माल को ही नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि देश के परिवहन और ऊर्जा ढांचे पर भी असर डाला है। रिपोर्टों के अनुसार सैकड़ों मेगावाट बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है और कई इलाकों में बुनियादी सेवाओं को बहाल करने का काम जारी है।
बालेन शाह ने इस आपदा को जलवायु परिवर्तन से जुड़े बढ़ते जोखिमों का गंभीर संकेत भी बताया है। उनका कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आशंका को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिलकर काम करना होगा।
नेपाल में राहत सहायता को लेकर एक दिलचस्प राजनीतिक पहलू भी सामने आया है। जहां प्रधानमंत्री शाह ने भारत और चीन की तत्काल मदद के लिए आभार जताया, वहीं नेपाल सरकार के एक मंत्री ने आपदा के संदर्भ में बड़े देशों से ‘क्लाइमेट कंपनसेशन’ की मांग की है। यानी नेपाल तत्काल राहत और दीर्घकालिक जलवायु जिम्मेदारी—दोनों मुद्दों को अलग-अलग स्तर पर उठा रहा है।
प्रधानमंत्री शाह का धन्यवाद ऐसे समय आया है जब भारत-नेपाल संबंधों को लेकर भी काफी चर्चा होती रही है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध हैं। प्राकृतिक आपदा के समय भारत की त्वरित सहायता इन संबंधों के मानवीय पक्ष को सामने लाती है।
भारत के लिए भी नेपाल की स्थिरता महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा, व्यापार, पर्यटन और लोगों के बीच गहरे सामाजिक संबंध हैं। इसलिए नेपाल में किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीमा पार के क्षेत्रों और दोनों देशों के नागरिकों पर भी पड़ सकता है।
इस पूरे अभियान में चीन ने भी नेपाल को सहायता दी है। बालेन शाह ने संसद में दोनों पड़ोसी देशों की मदद का उल्लेख किया। ऐसे समय में नेपाल को भारत और चीन दोनों से तकनीकी सहायता मिलना राहत अभियान के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता राजनीतिक बयानबाजी नहीं बल्कि राहत और बचाव है। हजारों परिवारों के सामने घर, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं को फिर से खड़ा करने की चुनौती है। लापता लोगों की तलाश और प्रभावित क्षेत्रों में जरूरी सेवाओं की बहाली अभी भी जारी है।
भारत की ओर से सहायता जारी रहने के संकेत भी मिल रहे हैं। 2 सितंबर को एक और भारतीय विमान नेपाल के लिए रवाना हुआ, जिसमें 11 सदस्यीय बचाव दल शामिल था। यह दिखाता है कि शुरुआती राहत के बाद भी भारत नेपाल के अभियान में लगातार सहयोग कर रहा है।
इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्र में सीमा-पार आपदा प्रबंधन की जरूरत भी सामने ला दी है। नेपाल, भारत और चीन—तीनों ही हिमालयी भूगोल और जलवायु जोखिमों से प्रभावित होते हैं। भविष्य में बेहतर शुरुआती चेतावनी प्रणाली, साझा डेटा और तेज राहत तंत्र जान बचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
बालेन शाह का संसद में भारत को धन्यवाद देना इसी मानवीय सहयोग की अहमियत को रेखांकित करता है। आपदा के समय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर पड़ोसी देश की मदद करना भारत-नेपाल संबंधों की व्यावहारिक ताकत को दिखाता है। साथ ही, नेपाल की ओर से जलवायु क्षतिपूर्ति की मांग यह संकेत देती है कि काठमांडू अब तत्काल राहत के साथ दीर्घकालिक जलवायु न्याय पर भी जोर देना चाहता है।
कुल मिलाकर, नेपाल की विनाशकारी बाढ़ के बीच भारत की शुरुआती और लगातार मानवीय सहायता को नेपाल ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह का धन्यवाद इस सहयोग का सार्वजनिक प्रमाण है। अब सबसे बड़ी चुनौती लापता लोगों को ढूंढना, प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाना और बाढ़ से तबाह बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करना है। इसके साथ ही यह आपदा पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए बढ़ते जलवायु जोखिमों की गंभीर चेतावनी भी बनकर सामने आई है।



