Nepal Flood: रसुवा-नुवाकोट में करीब 600 बच्चे लापता, राहत कार्य में क्यों हो रही देरी?

नेपाल में भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद तबाही का दर्द लगातार सामने आ रहा है। अब करीब 600 स्कूली बच्चों के लापता होने की खबर ने चिंता और बढ़ा दी है। रसुवा और नुवाकोट जिलों में कई स्कूल और बस्तियां बाढ़ की चपेट में आईं। कई शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई पूरी तरह बंद है और बच्चों तथा उनके परिवारों से संपर्क स्थापित करना मुश्किल हो रहा है।
रसुवा और नुवाकोट में कितने बच्चे लापता?
स्थानीय शिक्षा अधिकारियों के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक रसुवा में करीब 280 बच्चे, जबकि नुवाकोट में 300 से 350 बच्चे अब तक लापता बताए जा रहे हैं। अकेले बिदुर नगरपालिका में करीब 250 बच्चों का पता नहीं चला है।
हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि ये आंकड़े अभी अंतिम नहीं हैं। संचार व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होने के कारण स्कूलों और स्थानीय निकायों से पूरी जानकारी जुटाने तथा नामों का सत्यापन करने में समय लग रहा है।
12 स्कूल पूरी तरह तबाह
बाढ़ ने शिक्षा व्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। रसुवा के चार और नुवाकोट के आठ स्कूलों समेत कुल 12 स्कूल पूरी तरह नष्ट होने की जानकारी सामने आई है। कई अन्य स्कूलों की इमारतों में मलबा भर गया है या वे क्षतिग्रस्त हो गई हैं।
आपदा के बाद दोनों जिलों की कई स्थानीय इकाइयों में स्कूलों का संचालन पूरी तरह रोकना पड़ा है।
22 शिक्षक और स्कूल कर्मचारी भी लापता
संकट सिर्फ विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है। रसुवा और नुवाकोट में करीब 22 शिक्षक और स्कूल कर्मचारी भी लापता बताए जा रहे हैं। इससे स्कूल प्रशासन के स्तर पर भी स्थिति बेहद गंभीर हो गई है।
राहत कार्य में क्यों आ रही देरी?
नेपाल के कई प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव अभियान बेहद कठिन परिस्थितियों में चल रहा है। बाढ़ ने सड़कें, पुल और संचार नेटवर्क क्षतिग्रस्त कर दिए हैं। कई गांवों तक सड़क मार्ग से पहुंचना मुश्किल है और राहत दलों को हेलिकॉप्टरों तथा अस्थायी रास्तों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
दुर्गम पहाड़ी इलाकों में मलबा हटाना भी बड़ी चुनौती है। आपदा के बाद भारी मात्रा में मलबा जमा हुआ है, जिससे तलाशी अभियान की गति प्रभावित हो रही है।
संचार व्यवस्था बनी सबसे बड़ी बाधा
बच्चों की सही संख्या और उनकी स्थिति की पुष्टि में संचार व्यवस्था का ठप होना सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। कई प्रभावित क्षेत्रों में फोन और इंटरनेट सेवाएं बाधित हैं। स्कूलों, स्थानीय अधिकारियों और परिवारों के बीच संपर्क टूटने के कारण लापता बच्चों की सूची तैयार करने में भी समय लग रहा है।
यही वजह है कि प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ बच्चों की वास्तविक स्थिति का पता लगाना और दूसरी तरफ लापता बताए जा रहे बच्चों को खोजने के लिए अभियान चलाना।
हजारों लोग अब भी लापता
बच्चों का आंकड़ा नेपाल की व्यापक मानवीय त्रासदी का सिर्फ एक हिस्सा है। 4 सितंबर तक विभिन्न रिपोर्टों में नेपाल में 4,000 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है, जबकि मृतकों की संख्या 1,200 से ज्यादा हो चुकी है।
सुरक्षा बलों ने हजारों लोगों को बचाया है और दुर्गम इलाकों तक पहुंचने के लिए हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। फिर भी बड़े पैमाने पर मलबे और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के कारण तलाशी अभियान लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
नौ दिन बाद दो मजदूर मिले जिंदा, उम्मीद कायम
इसी भयावह स्थिति के बीच राहत की एक बड़ी खबर भी सामने आई। त्रिशूली-3A जलविद्युत परियोजना की सुरंग से नौ दिन बाद दो मजदूरों को जिंदा बचाया गया। बचाव दल ने सुरंग के भीतर से आवाजें सुनने के बाद अभियान तेज किया और दोनों तक पहुंचने में सफलता हासिल की।
इस घटना ने उन परिवारों में भी उम्मीद जगाई है जिनके अपने अभी तक लापता हैं।
बच्चों की तलाश क्यों बेहद जरूरी?
बाढ़ के बाद बच्चों के लापता होने का मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि कई परिवार विस्थापित हो चुके हैं। राहत शिविरों में पहुंचने वाले लोगों और लापता लोगों की सूचियों का मिलान करना जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि कितने बच्चे वास्तव में लापता हैं और कितने सुरक्षित स्थानों पर पहुंच चुके हैं।
इसके अलावा विस्थापित बच्चों के लिए सुरक्षित आश्रय, स्वच्छ पानी, भोजन, स्वास्थ्य सुविधाएं और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराना भी प्रशासन की प्राथमिकता बन गई है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां लापता लोगों की सूची को अपडेट करने, प्रभावित इलाकों तक पहुंच बहाल करने और मलबे में तलाशी अभियान जारी रखने में जुटी हैं। बच्चों के आंकड़ों का सत्यापन पूरा होने के बाद वास्तविक संख्या में बदलाव संभव है।
नेपाल की इस त्रासदी में करीब 600 बच्चों के लापता होने की खबर ने आपदा के मानवीय असर को और गहरा कर दिया है। संचार व्यवस्था की बहाली, दुर्गम क्षेत्रों तक तेजी से पहुंच और हर लापता बच्चे की पहचान व तलाश अब राहत अभियान की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल हैं।



