भारत का पहला स्वदेशी बैंक: 20,000 रुपये से हुई थी शुरुआत
भारत में जब स्वदेशी आंदोलन अपने चरम पर था, तब देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने सिर्फ राजनीतिक आज़ादी नहीं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता की नींव भी रखनी शुरू कर दी थी। इसी सोच का परिणाम था भारत का पहला ‘स्वदेशी बैंक’ – सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (Central Bank of India), जिसकी स्थापना 21 दिसंबर 1911 को सर सोराबजी पोचखानवाला द्वारा की गई थी। आश्चर्य की बात यह है कि इस बैंक की शुरुआत केवल ₹20,000 की पूंजी से की गई थी।
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया उस समय की पहली ऐसी बैंक थी, जो पूरी तरह से भारतीय पूंजी और प्रबंधन के नियंत्रण में थी। यह बैंक अंग्रेजों के अधीन उन बैंकों के विकल्प के रूप में खड़ा हुआ, जो भारतीयों को वित्तीय रूप से सीमित करने का काम कर रहे थे। सर पोचखानवाला ने एक साहसिक कदम उठाया और भारतीयों को यह विश्वास दिलाया कि देश में भी एक ऐसी बैंकिंग प्रणाली खड़ी की जा सकती है जो पूरी तरह अपने लोगों की जरूरतों के अनुसार काम करे।
इस बैंक ने भारत में कई ऐतिहासिक पहलें कीं – यह पहला बैंक था जिसने होम लोन और एजुकेशन लोन जैसी योजनाएं शुरू कीं। बैंक की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह शुरू से ही गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए काम करता रहा।
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने अपने शुरुआती वर्षों में ही आम जनता का भरोसा जीत लिया और धीरे-धीरे देश के कोने-कोने में अपनी शाखाएं फैलाने लगा। आज यह बैंक न सिर्फ भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुका है। इसमें लाखों ग्राहक जुड़े हुए हैं और यह बैंकिंग सेवा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है।
इतिहासकार मानते हैं कि इस बैंक की स्थापना सिर्फ एक व्यवसायिक पहल नहीं थी, बल्कि यह एक आर्थिक स्वतंत्रता की क्रांतिकारी शुरुआत थी। यह वह समय था जब भारतीय जनता को अपने ही देश में आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की जरूरत थी, और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ने यह भूमिका बखूबी निभाई।



