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मिग-21 से चीन ने कैसे बनाया जे-7 फाइटर जेट? जानें पूरी कहानी

हाल ही में बांग्लादेश में चीनी मूल के J-7 फाइटर जेट के क्रैश ने फिर से चर्चा छेड़ दी है कि आखिर ये लड़ाकू विमान बना कैसे? इस कहानी की जड़ें हैं सोवियत यूनियन (रूस) के मिग-21 में। 1960 के दशक में जब चीन और रूस के संबंध अच्छे थे, तब सोवियत संघ ने मिग-21 फाइटर जेट की तकनीक चीन को दी थी। चीन को उम्मीद थी कि वो इस तकनीक को खुद के हिसाब से ढालकर एक किफायती और शक्तिशाली फाइटर जेट बना सकेगा — और यहीं से जन्म हुआ J-7 (या F-7) फाइटर जेट का।

चीन ने मिग-21 की तकनीक पर आधारित J-7 का निर्माण शुरू किया, लेकिन यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं थी। सोवियत संघ द्वारा पूरी तकनीकी जानकारी साझा न करने और सीमित मदद देने के कारण चीन को खुद से कई टेक्नोलॉजी डेवलप करनी पड़ी। इसके बावजूद चीन ने J-7 को 1966 में तैयार कर लिया। यह मिग-21 जितना तेज और एडवांस्ड नहीं था, लेकिन इसकी कॉपी होने के बावजूद यह खुद एक स्वतंत्र डिज़ाइन के तौर पर विकसित हुआ। J-7 एकल इंजन, सुपरसोनिक, हल्के वजन वाला फाइटर जेट था, जिसे चीन ने दशकों तक अपने एयरफोर्स में इस्तेमाल किया और फिर कई देशों को एक्सपोर्ट भी किया — जिनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, नाइजीरिया और ईरान जैसे देश शामिल हैं।

J-7 को कई वेरिएंट्स में अपडेट किया गया, लेकिन इसकी नींव मिग-21 ही रही। यह विमान आज भी कई देशों के एयरफोर्स में सीमित रूप से उपयोग हो रहा है, हालांकि इसे अब पुराने जमाने की तकनीक माना जाता है। बांग्लादेश में हुए हालिया क्रैश ने दिखा दिया कि इन पुराने विमानों को अब रिटायर करने का समय आ गया है, क्योंकि इनकी सुरक्षा और तकनीकी क्षमताएं आधुनिक वायुसेना की जरूरतों के अनुकूल नहीं हैं।

इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि चीन ने मिग-21 को कॉपी ही नहीं किया, बल्कि उससे सीखकर अपने एयरोस्पेस उद्योग को आगे बढ़ाया, और बाद में इसी आधार पर कई नए एडवांस फाइटर जेट्स — जैसे J-10 और FC-31 — को विकसित किया। J-7 सिर्फ एक फाइटर जेट नहीं, बल्कि चीन के आत्मनिर्भर रक्षा विकास की पहली सीढ़ी भी था।

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