
हिरोशिमा परमाणु बम हमले की विभीषिका को दुनिया कभी नहीं भूल सकती। 6 अगस्त 1945 को जब अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर परमाणु बम गिराया था, तब लाखों निर्दोष लोगों की जानें गईं और कई पीढ़ियाँ उसकी त्रासदी से प्रभावित हुईं। उस हमले से जीवित बचे लोगों को हिबाकुशा कहा जाता है। ये लोग आज भी परमाणु हथियारों के खिलाफ और विश्व शांति की स्थापना के लिए दुनिया को संदेश देते रहते हैं। हाल ही में इन बचे हुए लोगों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की है, जिन्होंने वैश्विक मंचों पर हमेशा शांति, अहिंसा और संवाद की वकालत की है।
पीएम मोदी ने कई बार अपने भाषणों में यह स्पष्ट किया है कि युद्ध और हिंसा से किसी भी समस्या का समाधान संभव नहीं है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और जी-20 जैसे वैश्विक मंचों से भी मानवता को संदेश देते हुए कहा कि “यह समय युद्ध का नहीं, बल्कि शांति और मानव कल्याण के लिए मिलकर काम करने का है।” इस विचारधारा ने न केवल भारत की परंपरा और गांधीजी की शिक्षाओं को आगे बढ़ाया है, बल्कि उन देशों और समुदायों को भी प्रभावित किया है, जिन्होंने युद्ध की भयानक तबाही झेली है।
हिरोशिमा परमाणु हमले से बचे लोगों ने पीएम मोदी के इस रुख की सराहना करते हुए कहा कि आज की दुनिया में जब परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ रही है, तब भारत जैसे बड़े और जिम्मेदार देश का यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। मोदी का यह दृष्टिकोण मानव सभ्यता को विनाश से बचाने और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित वातावरण देने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
भारत और जापान के रिश्ते हमेशा से सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित रहे हैं। पीएम मोदी की यह सोच उन संबंधों को और गहरा करती है और वैश्विक स्तर पर भारत को शांति का प्रतीक बनाती है। हिरोशिमा की पीड़ा से गुजरे लोगों की ओर से मिली यह सराहना दर्शाती है कि शांति का संदेश सीमाओं से परे जाकर हर दिल तक पहुंचता है।



