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खाद्य मांग में धीमी बढ़ोतरी पर रमेश चंद की चिंता, निर्यात बढ़ाने पर दिया जोर

देश में खाद्य पदार्थों की मांग जिस रफ्तार से बढ़ रही है, वह भविष्य की कृषि रणनीति के लिए बड़ा संकेत है। नीति आयोग के सदस्य और प्रख्यात कृषि अर्थशास्त्री रमेश चंद ने कहा है कि भारत में खाद्य पदार्थों की घरेलू मांग सालाना केवल लगभग 2.5 प्रतिशत ही बढ़ रही है, जबकि उत्पादन की क्षमता और वास्तविक उत्पादन इससे कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि आने वाले वर्षों में देश के पास खाद्यान्न और कृषि उत्पादों का सरप्लस लगातार बढ़ता जाएगा। ऐसे में इस अतिरिक्त उत्पादन को खपाने के लिए केवल घरेलू बाजार पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वैश्विक बाजारों में निर्यात के नए अवसर तलाशने होंगे।

रमेश चंद के अनुसार, हरित क्रांति के बाद देश की कृषि प्रणाली ने उत्पादन बढ़ाने में बड़ी सफलता हासिल की है। गेहूं, चावल, चीनी, दुग्ध उत्पाद, फल-सब्जियां और कई नकदी फसलें अब जरूरत से ज्यादा मात्रा में पैदा हो रही हैं। दूसरी ओर, आबादी की वृद्धि दर में कमी, आय के पैटर्न में बदलाव और खाद्य आदतों में परिवर्तन के कारण खाद्य मांग की वृद्धि सीमित हो गई है। यही वजह है कि किसानों को कई बार अच्छी पैदावार के बावजूद उचित दाम नहीं मिल पाते, क्योंकि बाजार में आपूर्ति अपेक्षाकृत ज्यादा हो जाती है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि निर्यात को गंभीरता से नहीं लिया गया तो सरप्लस उत्पादन किसानों के लिए नुकसान का कारण बन सकता है। समाधान के तौर पर कृषि निर्यात नीति को और मजबूत करने, प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को बढ़ावा देने, गुणवत्ता मानकों में सुधार और लॉजिस्टिक्स लागत घटाने पर जोर देना होगा। वैश्विक स्तर पर भारतीय उत्पादों की ब्रांडिंग, फूड सेफ्टी मानकों का पालन और मूल्य संवर्धन ऐसी चीजें हैं, जो किसानों की आय बढ़ाने में भूमिका निभा सकती हैं।

अंत में रमेश चंद ने कहा कि भारत के पास दुनिया का एक बड़ा कृषि बाजार बनने की क्षमता है। जरूरत है तो दूरदर्शी नीतियों, निर्यात-अनुकूल माहौल और किसानों को वैश्विक मांग से जोड़ने की। यदि सही दिशा में कदम उठाए गए, तो सीमित घरेलू मांग के बावजूद कृषि सरप्लस देश की अर्थव्यवस्था के लिए अवसर बन सकता है, समस्या नहीं।

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