एंटीबायोटिक से बढ़ रही ‘खामोश महामारी’, पीएम मोदी की चेतावनी को एक्सपर्ट्स ने बताया बेहद जरूरी

एंटीबायोटिक का जरूरत से ज्यादा और गलत इस्तेमाल दुनिया भर में एक “खामोश महामारी” को जन्म दे रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (Antimicrobial Resistance – AMR) को लेकर लोगों और स्वास्थ्य व्यवस्था को सतर्क रहने की सलाह दी, जिसे चिकित्सा विशेषज्ञों ने समय की सबसे बड़ी जरूरत बताया है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि अभी इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में साधारण संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकते हैं।
पीएम मोदी ने कहा कि एंटीबायोटिक दवाओं का बिना डॉक्टर की सलाह के सेवन और अधूरा कोर्स पूरा न करना गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। अक्सर लोग सर्दी, खांसी या वायरल बुखार में भी एंटीबायोटिक ले लेते हैं, जबकि इन बीमारियों में इसकी जरूरत नहीं होती। इससे बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं और भविष्य में वही दवाएं बेअसर हो जाती हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक ऐसी समस्या है जो धीरे-धीरे बढ़ती है और जब सामने आती है, तब तक स्थिति काफी गंभीर हो चुकी होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठनों की रिपोर्ट्स भी इशारा करती हैं कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो 2050 तक AMR से होने वाली मौतें कैंसर से भी ज्यादा हो सकती हैं। भारत जैसे देश में, जहां दवाएं आसानी से उपलब्ध हैं, यह खतरा और भी बड़ा है।
एक्सपर्ट्स ने पीएम मोदी की सलाह का समर्थन करते हुए कहा कि एंटीबायोटिक का सही समय पर, सही मात्रा में और पूरा कोर्स लेना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही डॉक्टरों को भी सोच-समझकर दवाएं लिखनी चाहिए और फार्मेसियों पर बिना पर्ची के एंटीबायोटिक बिक्री पर सख्ती होनी चाहिए। इसके अलावा, स्वच्छता, टीकाकरण और संक्रमण से बचाव के उपाय AMR को रोकने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ सरकार या डॉक्टरों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आम जनता को भी जागरूक होना होगा। पीएम मोदी की अपील इसी दिशा में एक मजबूत कदम है, जो लोगों को यह समझाने का प्रयास करती है कि एंटीबायोटिक कोई साधारण दवा नहीं, बल्कि एक अमूल्य संसाधन है। अगर इसका सही उपयोग नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।



