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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत को समुद्री क्षेत्र में चीन के खिलाफ मजबूत बनाएगा : रिपोर्ट

केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का उद्देश्य भारत की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, वैश्विक पूर्व-पश्चिम शिपिंग मार्ग से इसकी निकटता का लाभ उठाकर और विदेशी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर निर्भरता कम करके द्वीप को एक रणनीतिक समुद्री और आर्थिक केंद्र में बदलना है। यह जानकारी एक लेख में दी गई।

यह प्रोजेक्ट अंडमान सागर और दक्षिणपूर्व एशिया में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करेगा। साथ ही, बंदरगाह आधारित आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों की सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

यह बंदरगाह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूर्व-पश्चिम अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी मार्ग के निकट स्थित है, जो लगभग 40 समुद्री मील दूर है, और इसकी प्राकृतिक जल गहराई 20 मीटर से अधिक है। इस रणनीतिक स्थिति के कारण यह प्रवेश द्वार और पारगमन दोनों प्रकार के माल को आकर्षित करने में सक्षम है, जिससे कोलंबो, सिंगापुर और क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम हो जाती है।

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में प्रकाशित लेख के अनुसार, यह परियोजना उस जलमार्ग के निकट स्थित है जो चीन के कच्चे तेल के आयात और व्यापार प्रवाह के लिए भी महत्वपूर्ण है। विश्लेषक अकसर इसे बीजिंग की “मलक्का डिलेमा” बताते हैं।

लेख में भारतीय सेना के पूर्व अधिकारी और सैन्य राजनयिक, ब्रिगेडियर संजय अय्यर (सेवानिवृत्त) के हवाले से कहा गया है, “ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट संभवतः हाल के दशकों में भारत द्वारा किए गए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक दांवों में से एक है।”

उन्होंने बताया कि यह प्रोजेक्ट भारत को पूर्वी हिंद महासागर में निरंतर उपस्थिति, क्षेत्र से गुजरने वाली गतिविधियों की बेहतर जानकारी और “पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभाव” प्रदान करेगी।

अय्यर ने बताया कि ग्रेट निकोबार मलक्का स्ट्रेट के किनारे पर स्थित है, जो विश्व के समुद्री व्यापार का लगभग एक चौथाई से एक तिहाई हिस्सा संभालता है, जबकि चीन के समुद्री व्यापार का दो-तिहाई और तेल आयात का लगभग 70-80 प्रतिशत हिस्सा इसी स्ट्रेट से होकर गुजरता है।

अय्यर ने कहा, “बीजिंग ने ‘मलक्का डिलेमा’ को लेकर खुलकर चिंता जताई है, यानी ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा एक संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है जिस पर उसका नियंत्रण नहीं है, और इस वजह से बीजिंग असुरक्षित है। ग्रेट निकोबार जलडमरूमध्य इस दुविधा को और भी गंभीर बना देता है।”

उन्होंने बताया कि अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद से मलक्का का एक संभावित चोकपॉइंट के रूप में महत्व बढ़ गया है, क्योंकि इस युद्ध ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजरानी और ऊर्जा निर्यात को बाधित कर दिया है।

अय्यर ने कहा कि हालांकि भारत शांति काल में स्ट्रेट की नाकाबंदी नहीं करेगा, लेकिन ग्रेट निकोबार पर मौजूद बुनियादी ढांचा चीन की नौसेना, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र और हिंद महासागर की गतिविधियों पर नजर रखने की भारत की क्षमता को बढ़ाता है।

लेख में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया है कि भारत हिंद महासागर की क्षमता का पूरी तरह से उपयोग नहीं कर रहा है, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाली वाणिज्य और ऊर्जा आपूर्ति की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

इसके विपरीत, बीजिंग हिंद महासागर तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए श्रीलंका, पाकिस्तान और जिबूती में विदेशी वाणिज्यिक और सैन्य बुनियादी ढांचे, ऊर्जा पाइपलाइनों और नौसैनिक सुविधाओं का एक नेटवर्क बना रहा है।

अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उदय चंद्र ने साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट को बताया,”ग्रेट निकोबार भारत को एक समुद्री शक्ति, या विशेष रूप से एक द्वीपीय शक्ति के रूप में सोचने के लिए प्रेरित करता है। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह वह स्थान है जहां भारत दक्षिणपूर्व एशिया से जुड़ता है।”

भारत के बंदरगाहों में बड़े जहाजों के लिए गहरे पानी के बर्थ की कमी है। इस कारण माल कोलंबो और सिंगापुर के रास्ते भेजा जाता है। परिणामस्वरूप भारत को राजस्व का भारी नुकसान होता है। म्यांमार, चीन और श्रीलंका जैसे देश इस व्यापार को हासिल करने के लिए पहले से ही गहरे पानी की सुविधाओं का निर्माण कर रहे हैं।

द्वीप विकास कार्यक्रम के तहत ग्रेट निकोबार द्वीप के समग्र विकास के हिस्से के रूप में गलाथिया खाड़ी में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (आईसीटीपी) विकसित किया जा रहा है। प्रस्तावित हवाई अड्डे, टाउनशिप और बिजली संयंत्र के साथ, गलाथिया खाड़ी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट समग्र ग्रेट निकोबार परियोजना का एक प्रमुख अवसंरचनात्मक घटक है।

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