ग्वादर पर पाकिस्तान का बड़ा प्लान? बलूचिस्तान में बढ़ा विरोध

पाकिस्तान में ग्वादर के भविष्य और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर नई राजनीतिक हलचल शुरू हो गई है। बलूचिस्तान में ऐसी चर्चाएं सामने आई हैं कि ग्वादर को प्रांतीय प्रशासन से हटाकर सीधे संघीय नियंत्रण में लाया जा सकता है। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई अंतिम सरकारी फैसला सार्वजनिक नहीं हुआ है। बलूचिस्तान के जमात-ए-इस्लामी नेता मौलाना हिदायतुर रहमान ने ऐसी किसी भी कोशिश का कड़ा विरोध करने की चेतावनी दी है।
ग्वादर का महत्व इसलिए बहुत ज्यादा है क्योंकि यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का प्रमुख केंद्र है। चीन यहां बंदरगाह और फ्री जोन समेत कई परियोजनाओं में निवेश कर रहा है। CPEC का उद्देश्य पश्चिमी चीन को सड़क, रेल और अन्य संपर्क माध्यमों के जरिए ग्वादर और अरब सागर से जोड़ना है।
चीन के लिए ग्वादर की रणनीतिक अहमियत सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। अरब सागर तक सीधी पहुंच चीन के लिए पश्चिमी एशिया और वैश्विक समुद्री व्यापार से जुड़ने का विकल्प उपलब्ध कराती है। यही वजह है कि बलूचिस्तान में अस्थिरता और चीनी परियोजनाओं की सुरक्षा पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए बड़ी चिंता बनी हुई है।
दूसरी ओर, स्थानीय बलूच नेताओं का आरोप है कि ग्वादर और पूरे बलूचिस्तान में सुरक्षा और विकास से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की भागीदारी पर्याप्त नहीं है। ग्वादर को संघीय क्षेत्र बनाने की किसी भी कोशिश को वे स्थानीय अधिकारों पर हमला मान रहे हैं। मौलाना हिदायतुर रहमान ने कहा है कि ऐसे फैसले थोपे गए तो स्थानीय आबादी और राजनीतिक ताकतें इसका विरोध करेंगी।
बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा और संसाधनों पर अधिकार को लेकर संघर्ष चल रहा है। 2026 में भी क्षेत्र में हिंसक घटनाओं ने पाकिस्तान के सामने सुरक्षा चुनौती बढ़ाई है। ऐसे माहौल में ग्वादर पर केंद्र का नियंत्रण बढ़ाने की किसी भी कोशिश से स्थानीय असंतोष और तेज होने की आशंका जताई जा रही है।
फिलहाल ग्वादर को चीन को सौंपने या चीन के कब्जे में देने का कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है। मौजूदा विवाद मुख्य रूप से इसे संघीय नियंत्रण में लाने की चर्चाओं और उसके विरोध से जुड़ा है। अगर ऐसा कदम वास्तव में उठाया जाता है, तो इसका असर बलूचिस्तान की राजनीति, CPEC की सुरक्षा और चीन-पाकिस्तान संबंधों पर दूरगामी हो सकता है।



