Pakistan Crisis: मौलाना फजलुर रहमान ने आसिम मुनीर को चेताया, बोले- ढाका की गलती न दोहराएं

पाकिस्तान में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल लागू किए जाने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। इसी बीच जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने सैन्य नेतृत्व को 1971 की घटनाओं से सबक लेने की चेतावनी दी है। उन्होंने सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण और राजनीतिक अधिकारों की अनदेखी पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि देश के भविष्य से जुड़े फैसलों में जनता और निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। <Cite refs={[“turn646866news2″,”turn646866news8”]} />
‘पाकिस्तान किसी परिवार की निजी संपत्ति नहीं’
मौलाना फजलुर रहमान ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान किसी परिवार की निजी संपत्ति नहीं है। उन्होंने सैन्य नेतृत्व और सत्तारूढ़ गठबंधन पर सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण करने का आरोप लगाया। उन्होंने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ कथित असमान व्यवहार पर भी सवाल उठाए और कहा कि यदि राज्य संस्थाएं राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अधिकारों का सम्मान नहीं करेंगी, तो राजनीतिक सहयोग की उम्मीद करना मुश्किल होगा। ये बयान पाकिस्तान में नागरिक शासन और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच शक्ति संतुलन को लेकर जारी बहस का हिस्सा हैं। <Cite refs={[“turn646866news2”]} />
ढाका का जिक्र कर 1971 की याद क्यों दिलाई?
फजलुर रहमान ने दिसंबर 1971 की उस घटना का उल्लेख किया, जब पाकिस्तानी सेना ने ढाका में आत्मसमर्पण किया था और पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर बांग्लादेश बना। उन्होंने तत्कालीन सैन्य शासक जनरल याह्या खान के बयानों और बाद में हुए आत्मसमर्पण का हवाला देते हुए चेताया कि केवल सैन्य शक्ति के भरोसे राजनीतिक संकट का समाधान नहीं किया जा सकता। उनके बयान का मुख्य संदेश यह था कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रांतीय अधिकारों और जनता की भागीदारी की अनदेखी गंभीर परिणाम ला सकती है। <Cite refs={[“turn646866news2″,”turn646866news8”]} />
खैबर पख्तूनख्वा में क्यों लगाया गया आपातकाल?
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने 11 अक्टूबर 2026 को खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल की घोषणा की थी। इस फैसले के साथ जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार को निलंबित कर दिया गया। संघीय सरकार ने बढ़ते आतंकवादी हमलों और सुरक्षा व्यवस्था में गिरावट को इसका कारण बताया। वहीं PTI ने इस कदम को राजनीतिक कार्रवाई करार दिया और अदालत में चुनौती दी।
इमरान खान की पार्टी और केंद्र सरकार के बीच टकराव
खैबर पख्तूनख्वा लंबे समय से PTI का प्रमुख राजनीतिक गढ़ रहा है। आपातकाल लागू होने से प्रांत में केंद्र और PTI के बीच टकराव और गहरा गया है। PTI का आरोप है कि आपातकाल का इस्तेमाल इमरान खान की रिहाई और उनके समर्थन में प्रस्तावित प्रदर्शनों को रोकने के लिए किया गया। दूसरी ओर, संघीय सरकार का कहना है कि प्रांत में आतंकवाद से निपटने के लिए प्रभावी कदम उठाना जरूरी है। इस विवाद ने पाकिस्तान में संघीय अधिकारों, प्रांतीय स्वायत्तता और सुरक्षा नीति पर बहस तेज कर दी है।
सेना और नागरिक शासन के बीच शक्ति संतुलन पर सवाल
फजलुर रहमान की चेतावनी ऐसे समय आई है, जब पाकिस्तान में सेना की राजनीतिक भूमिका और निर्वाचित सरकारों के अधिकारों को लेकर बहस जारी है। विपक्षी दल सैन्य प्रतिष्ठान पर राजनीति में दखल देने के आरोप लगाते रहे हैं, जबकि सेना राजनीतिक मामलों में अपनी भूमिका को लेकर लगाए गए आरोपों से इनकार करती रही है। खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल के बाद यह विवाद और गंभीर हो गया है। फजलुर रहमान ने राजनीतिक संवाद और जनता के अधिकारों का सम्मान करने की जरूरत पर जोर दिया है।
क्या पाकिस्तान में दोबारा विभाजन का खतरा है?
ढाका का संदर्भ पाकिस्तान के इतिहास की एक बड़ी राजनीतिक और सैन्य पराजय की याद दिलाता है। हालांकि, मौजूदा संकट की तुलना सीधे 1971 की परिस्थितियों से करना उचित नहीं होगा। वर्तमान घटनाक्रम में आपातकाल, प्रांतीय स्वायत्तता, आतंकवाद और राजनीतिक संघर्ष जैसे मुद्दे शामिल हैं। फजलुर रहमान ने 1971 का उल्लेख चेतावनी के रूप में किया है; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पाकिस्तान का दोबारा विभाजन निश्चित है। आगे की स्थिति राजनीतिक संवाद, कानूनी प्रक्रिया और सुरक्षा हालात पर निर्भर करेगी।



