Low NAV बनाम High NAV म्यूचुअल फंड: निवेश से पहले जान लें पूरी सच्चाई

म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले कई निवेशकों के मन में यह सवाल जरूर आता है कि क्या Low NAV (नेट एसेट वैल्यू) वाले म्यूचुअल फंड में पैसा लगाना ज्यादा फायदेमंद होता है। अक्सर यह धारणा बना ली जाती है कि कम NAV वाला फंड “सस्ता” है और आगे चलकर ज्यादा रिटर्न देगा, जबकि High NAV वाला फंड “महंगा” है। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि NAV किसी म्यूचुअल फंड की प्रति यूनिट कीमत होती है। यह कीमत फंड की कुल संपत्ति में से खर्च घटाकर, कुल यूनिट्स से भाग देने पर निकलती है। इसका मतलब यह हुआ कि NAV का सीधा संबंध फंड के साइज या उसकी गुणवत्ता से नहीं, बल्कि उसके इतिहास और समय के साथ हुए रिटर्न से होता है।
Low NAV आमतौर पर दो कारणों से होता है। पहला, फंड नया हो सकता है और अभी ज्यादा समय तक निवेश नहीं हुआ हो। दूसरा, फंड का प्रदर्शन लंबे समय तक औसत या कमजोर रहा हो। वहीं High NAV इस बात का संकेत हो सकता है कि फंड ने समय के साथ अच्छा प्रदर्शन किया है और उसमें कंपाउंडिंग का लाभ मिला है। इसलिए केवल NAV देखकर यह तय करना कि कौन सा फंड बेहतर है, एक बड़ी गलती हो सकती है।
निवेश के लिहाज से जरूरी यह है कि फंड का रिटर्न प्रतिशत, पोर्टफोलियो की गुणवत्ता, फंड मैनेजर का ट्रैक रिकॉर्ड, एक्सपेंस रेशियो और निवेश का उद्देश्य क्या है। उदाहरण के तौर पर, यदि दो फंड 10% का सालाना रिटर्न देते हैं, तो चाहे उनका NAV ₹20 हो या ₹200, निवेशक को फायदा प्रतिशत के हिसाब से ही मिलेगा, न कि NAV के आधार पर।
Low NAV वाला फंड आपको ज्यादा यूनिट्स जरूर देगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मुनाफा ज्यादा होगा। मुनाफा इस बात पर निर्भर करता है कि भविष्य में फंड कितना अच्छा प्रदर्शन करता है। इसलिए निवेश से पहले यह देखना ज्यादा समझदारी है कि फंड किस कैटेगरी का है, उसका रिस्क लेवल क्या है और वह आपके वित्तीय लक्ष्य से मेल खाता है या नहीं।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि Low NAV कोई जादुई फॉर्मूला नहीं है जो ज्यादा रिटर्न की गारंटी दे। सही म्यूचुअल फंड चुनने के लिए NAV नहीं, बल्कि फंड की मजबूत बुनियाद और लंबी अवधि का प्रदर्शन सबसे अहम होता है। समझदारी से किया गया निवेश ही लंबे समय में असली फायदा देता है।



