‘सरकारी बैंकों और कंपनियों का जल्द हो निजीकरण’, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने बताया विकसित भारत का रोडमैप

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को लेकर व्यापक आर्थिक सुधारों की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकारी बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों के निजीकरण पर तेजी से आगे बढ़ना चाहिए, ताकि अर्थव्यवस्था की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाई जा सके।
उनके अनुसार निजीकरण से संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव होता है और सरकार को उन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलता है, जहां उसकी भूमिका आवश्यक है। उनका मानना है कि आर्थिक विकास की तेज गति बनाए रखने के लिए संरचनात्मक सुधारों को आगे बढ़ाना जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि निजीकरण के पक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि निजी क्षेत्र आमतौर पर दक्षता, नवाचार और पूंजी निवेश के मामले में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। वहीं आलोचकों का मानना है कि रणनीतिक क्षेत्रों में सरकार की भूमिका पूरी तरह कम नहीं की जानी चाहिए।
पूर्व नीति आयोग उपाध्यक्ष ने यह भी कहा कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए निवेश, रोजगार, औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार पर समान रूप से ध्यान देना होगा। उनके अनुसार आर्थिक सुधारों का उद्देश्य केवल विकास दर बढ़ाना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता तैयार करना भी होना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि सार्वजनिक क्षेत्र की उन इकाइयों का पुनर्गठन या निजीकरण किया जाए, जहां सरकार की प्रत्यक्ष भागीदारी आवश्यक नहीं है। इससे सरकारी वित्तीय बोझ कम हो सकता है और निजी निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है।
आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार भारत में निजीकरण और विनिवेश लंबे समय से नीति बहस का विषय रहे हैं। आने वाले वर्षों में सरकार की आर्थिक रणनीति और सुधारों की दिशा इस बात को तय करेगी कि विकसित भारत के लक्ष्य की ओर बढ़ने में कौन से कदम सबसे प्रभावी साबित होते हैं।
फिलहाल निजीकरण पर यह टिप्पणी आर्थिक और राजनीतिक दोनों हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है और इसे भारत के भविष्य के विकास मॉडल से जोड़कर देखा जा रहा है।



