आजादी के बाद पहला बजट: कम आय वालों को छूट और सरल कर व्यवस्था की कहानी

भारत के इतिहास में आज़ादी के बाद पेश किया गया पहला बजट न केवल आर्थिक दृष्टि से, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण था। यह बजट 26 नवंबर 1947 को तत्कालीन वित्त मंत्री आर. के. षणमुखम चेट्टी ने संविधान लागू होने से पहले अंतरिम सरकार की ओर से प्रस्तुत किया था, लेकिन गणतंत्र बनने की दिशा में यह पहला ठोस आर्थिक दस्तावेज माना जाता है। उस समय देश विभाजन की पीड़ा, शरणार्थियों की समस्या और कमजोर अर्थव्यवस्था से जूझ रहा था। ऐसे में बजट का मुख्य उद्देश्य आम जनता पर कर का बोझ कम रखना और देश को आत्मनिर्भर बनाने की नींव रखना था।
उस दौर की कर व्यवस्था आज की तुलना में बेहद सरल और आम आदमी के अनुकूल थी। इनकम टैक्स की दरें ‘चार आने’ और ‘आठ आने’ जैसे छोटे सिक्कों के हिसाब से तय होती थीं। उस समय एक रुपया 16 आने का होता था, यानी टैक्स दरें बेहद कम थीं। कम आय वाले लोगों को इनकम टैक्स से पूरी तरह छूट दी गई थी, ताकि आज़ादी के बाद आम नागरिक राहत महसूस कर सके। सरकार का मानना था कि देश की अर्थव्यवस्था को खड़ा करने के लिए जनता की क्रय शक्ति बढ़ाना ज़रूरी है।
पहले बजट में खेती, सिंचाई, उद्योग और बुनियादी ढांचे पर खास ध्यान दिया गया। रेलवे, डाक और रक्षा जैसे क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए संसाधन जुटाए गए, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि कर प्रणाली कठोर न हो। उस समय आय का स्तर कम था, इसलिए सरकार ने अप्रत्यक्ष करों और सीमित प्रत्यक्ष करों के संतुलन से राजस्व जुटाने की कोशिश की।
आज जब इनकम टैक्स की दरें स्लैब, सरचार्ज और सेस के साथ जटिल हो चुकी हैं, तब पहला बजट हमें याद दिलाता है कि कर व्यवस्था का उद्देश्य केवल राजस्व जुटाना नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन और आर्थिक विकास भी होना चाहिए। ‘चार आने-आठ आने’ के टैक्स का दौर भले ही इतिहास बन चुका हो, लेकिन उस समय की सोच आज भी प्रासंगिक है—कम कमाने वालों को राहत और देश के विकास के लिए साझा जिम्मेदारी।



