उत्तर प्रदेश के संभल जिले में हाल ही में एक विवादास्पद दृश्य सामने आया, जब हिंसा के एक आरोपी का जेल से छूटने के बाद भव्य स्वागत किया गया। आरोपी के समर्थन में न केवल फूलों की माला पहनाई गई, बल्कि 42 किलोमीटर लंबा रोड शो भी निकाला गया। इस दौरान आरोपी ने खुली जीप में खड़े होकर लोगों का अभिवादन किया और हाथ हिलाकर स्वागत का जवाब दिया।
इस पूरे घटनाक्रम ने कानून-व्यवस्था और राजनीतिक नैतिकता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोपी पर संभल में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में शामिल होने का आरोप था और वह काफी समय से जेल में बंद था। उसकी रिहाई पर जिस तरह से सैकड़ों समर्थकों ने रोड शो के रूप में “विजय जुलूस” निकाला, उसने पूरे प्रदेश में हलचल पैदा कर दी है।
सबसे चौंकाने वाली बात आरोपी का बयान था, जिसमें उसने कहा,
“अगर मेरे पास पावर होती, तो मुझे जेल ही नहीं जाना पड़ता।”
इस बयान को लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। विपक्षी दलों ने इसे “कानून की अवमानना” और “राज्य सरकार की असफलता” करार दिया है।
वीडियो फुटेज में साफ देखा गया कि आरोपी को फूल-मालाओं से लाद दिया गया, डीजे की धुन पर समर्थकों ने नाचते हुए जुलूस निकाला, और सोशल मीडिया पर इसका सीधा प्रसारण किया गया। पूरे रास्ते में भारी संख्या में समर्थक बाइक और कारों के काफिले के साथ चलते दिखे, जिससे ट्रैफिक व्यवस्था भी चरमरा गई।
प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। अब तक न तो किसी आयोजक पर कार्रवाई की गई है, न ही इस तरह के “सामाजिक तनाव बढ़ाने वाले आयोजन” को रोकने की कोई कोशिश की गई। पुलिस और जिला प्रशासन ने इस पूरे रोड शो को “सुरक्षा की दृष्टि से नियंत्रित” बताकर अपनी भूमिका से पल्ला झाड़ लिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना सिर्फ एक आरोपी की रिहाई का मामला नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक शक्ति प्रदर्शन है, जो स्थानीय स्तर पर सत्ता की समीकरणों को दर्शाता है। ऐसे आयोजनों से यह भी संदेश जाता है कि प्रभावशाली लोग कानून के दायरे से ऊपर माने जाते हैं।
निष्कर्षतः, संभल में हुए इस रोड शो ने न सिर्फ समाज में गलत संदेश भेजा, बल्कि यह भी उजागर किया कि किस तरह कुछ लोग कानून का मज़ाक बनाकर राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग कर रहे हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन और सरकार इस पर क्या रुख अपनाते हैं—क्या कोई सख्त कार्रवाई होगी या मामला यूं ही दबा दिया जाएगा?



