
फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने दिल्ली में अपने संबोधन के दौरान वैश्विक राजनीति को लेकर एक स्पष्ट और सशक्त संदेश दिया कि भारत और फ्रांस जैसे लोकतांत्रिक देशों को अमेरिका या चीन पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करना चाहिए। मैक्रों का यह बयान ऐसे समय आया है जब विश्व व्यवस्था बहुध्रुवीय होती जा रही है और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच कई देश संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत और फ्रांस दोनों ही संप्रभु निर्णय लेने की परंपरा रखते हैं और रक्षा, तकनीक, ऊर्जा तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाकर एक वैकल्पिक वैश्विक मॉडल पेश कर सकते हैं। मैक्रों ने इस बात पर जोर दिया कि साझेदारी का अर्थ किसी तीसरे देश के खिलाफ खड़ा होना नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए साझा मूल्यों—लोकतंत्र, कानून का शासन और बहुपक्षवाद—को आगे बढ़ाना है। उन्होंने यह भी कहा कि सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाना समय की मांग है। भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सौदों, अंतरिक्ष सहयोग और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर और मजबूत हुई है। विश्लेषकों का मानना है कि मैक्रों का यह संदेश वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए भी संकेत है कि वे बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा में मोहरा बनने के बजाय अपने हितों के अनुरूप संतुलित कूटनीति अपनाएं। दिल्ली से दिया गया यह संदेश केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में नई सोच और नए गठजोड़ की आवश्यकता को रेखांकित करता है।



