
चक्रवात दितवाह के कहर के बाद श्रीलंका गंभीर मानवीय संकट से जूझ रहा था। तेज़ हवाओं, भारी बारिश और बाढ़ ने देश के कई इलाकों में जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर अचानक मरीजों का भारी दबाव बढ़ गया, वहीं दवाइयों और मेडिकल संसाधनों की कमी भी सामने आने लगी। ऐसे मुश्किल समय में भारत ने एक जिम्मेदार पड़ोसी और सच्चे मित्र की भूमिका निभाते हुए श्रीलंका को मानवीय सहायता प्रदान की। भारत की इस पहल से 7,176 मरीजों को तत्काल राहत और जरूरी इलाज मिल सका।
आपदा के तुरंत बाद भारत ने मेडिकल सहायता, आवश्यक दवाइयों और राहत सामग्री की खेप श्रीलंका भेजी। भारतीय डॉक्टरों और मेडिकल टीमों ने स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं बहाल करने में अहम भूमिका निभाई। बाढ़ और चक्रवात से फैलने वाली बीमारियों जैसे डायरिया, बुखार, त्वचा संक्रमण और सांस संबंधी समस्याओं से पीड़ित मरीजों का इलाज प्राथमिकता के आधार पर किया गया। खास बात यह रही कि दूरदराज़ और ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों तक भी भारतीय सहायता समय पर पहुंची।
भारत की इस मदद से न केवल मरीजों को इलाज मिला, बल्कि श्रीलंका के स्वास्थ्य ढांचे पर पड़े दबाव को भी काफी हद तक कम किया जा सका। स्थानीय लोगों ने भारत की इस त्वरित और निस्वार्थ सहायता की सराहना की। यह पहली बार नहीं है जब भारत ने संकट के समय श्रीलंका का हाथ थामा हो। चाहे प्राकृतिक आपदा हो, आर्थिक संकट या स्वास्थ्य आपातकाल—भारत हमेशा “पड़ोसी पहले” की नीति पर चलते हुए आगे आया है।
चक्रवात दितवाह के बाद दी गई यह सहायता भारत–श्रीलंका के गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवीय संबंधों को और मजबूत करती है। यह पहल दर्शाती है कि भारत केवल कूटनीतिक साझेदार ही नहीं, बल्कि मुश्किल घड़ी में भरोसेमंद मित्र भी है। 7,176 मरीजों को मिली राहत इस बात का प्रमाण है कि आपदा के समय मानवीय संवेदनाएं और सहयोग सीमाओं से ऊपर होते हैं। भविष्य में भी ऐसी साझेदारी दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी।



