
छत्तीसगढ़ का झीरम घाटी कांड भारतीय राजनीति और आंतरिक सुरक्षा के इतिहास का एक ऐसा दर्दनाक अध्याय है, जिसे 12 साल बीत जाने के बाद भी पूरी तरह भुलाया नहीं जा सका है। 25 मई 2013 को नक्सल प्रभावित झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए भीषण हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस हमले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता, कार्यकर्ता और सुरक्षाकर्मी मारे गए थे, जिनकी कुल संख्या 32 तक पहुंची थी। यह हमला केवल एक राजनीतिक दल पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधा प्रहार माना गया।
घटना के बाद देशभर में शोक और आक्रोश का माहौल बना, लेकिन समय बीतने के साथ झीरम कांड का सच पूरी तरह सामने नहीं आ सका। जांच एजेंसियों ने कई नक्सलियों को आरोपी बनाया, कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन साजिश के पीछे की पूरी कहानी और कथित राजनीतिक भूमिका पर सवाल आज भी बने हुए हैं। पीड़ित परिवारों और समाज के एक बड़े वर्ग का मानना है कि उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है।
इसी मुद्दे को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच लगातार राजनीतिक रार देखने को मिलती रही है। कांग्रेस जहां तत्कालीन राज्य और केंद्र सरकारों पर सच्चाई छिपाने और निष्पक्ष जांच न होने का आरोप लगाती है, वहीं भाजपा कांग्रेस पर इस त्रासदी को राजनीतिक लाभ के लिए भुनाने का आरोप लगाती रही है। दोनों दल एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते हुए आरोप-प्रत्यारोप करते रहे हैं, लेकिन आम जनता और पीड़ित परिवार आज भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं।
12 साल बाद भी झीरम कांड केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि न्याय और जवाबदेही की मांग का प्रतीक बना हुआ है। यह घटना याद दिलाती है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए और ऐसे मामलों में राजनीति से ऊपर उठकर सच्चाई सामने लाना आवश्यक है। जब तक झीरम कांड का पूरा सच सार्वजनिक नहीं होता, तब तक यह सवाल बना रहेगा कि आखिर 32 निर्दोष लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन था और उन्हें न्याय कब मिलेगा।



