
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने समाज में बढ़ती कटु और हिंसक भाषा पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि “तेरे टुकड़े होंगे” जैसी भाषा अब नहीं चलेगी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह समय भारत के लिए जीने का है, न कि आपसी नफरत और विभाजन को बढ़ावा देने का। उनके इस बयान को देश में सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता, सहिष्णुता और आपसी सम्मान से है। अगर समाज में डर, धमकी और नफरत की भाषा को बढ़ावा दिया जाएगा तो इससे देश की मूल भावना को नुकसान पहुंचेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि मतभेद हो सकते हैं, विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन संवाद और समझदारी के जरिए समाधान निकालना ही भारतीय परंपरा रही है।
RSS प्रमुख ने युवाओं को खास संदेश देते हुए कहा कि उन्हें उग्र नारों और आक्रामक सोच से दूर रहना चाहिए। देश के भविष्य के निर्माण में युवाओं की भूमिका सबसे अहम है और अगर वे सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी भारत मजबूत बनेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर इस्तेमाल होने वाली भाषा का समाज पर गहरा असर पड़ता है, इसलिए हर किसी को अपने शब्दों की जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
अपने भाषण में मोहन भागवत ने राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता पर जोर देते हुए कहा कि भारत को आगे बढ़ाने के लिए सभी वर्गों, समुदायों और विचारधाराओं को साथ चलना होगा। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि देश की प्रगति किसी एक समूह के बल पर नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास से संभव है। नफरत और धमकी की भाषा देश को कमजोर करती है, जबकि सहयोग और विश्वास उसे मजबूत बनाते हैं।
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में उनके इस बयान को एक बड़े संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा दौर में जब सार्वजनिक विमर्श अक्सर तीखे और आक्रामक शब्दों में बदल जाता है, ऐसे में मोहन भागवत का यह बयान संतुलन और संयम की याद दिलाता है। कुल मिलाकर, उनका यह संदेश साफ है कि भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए नफरत नहीं, बल्कि एकता, संवाद और सकारात्मक सोच की जरूरत है।



