
देश में सामाजिक सौहार्द और एकता को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता सामने आई है। Supreme Court of India के न्यायाधीश Justice Ujjal Bhuyan ने हालिया टिप्पणी में कहा कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी समाज के भीतर मौजूद दरारें पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार और गरिमा दी है, लेकिन जमीनी स्तर पर सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक विभाजन अब भी महसूस किए जा सकते हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि समाज में आपसी विश्वास, सम्मान और भाईचारे से भी तय होती है। यदि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास बढ़ता है तो इसका असर न्याय व्यवस्था और शासन प्रणाली पर भी पड़ता है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे संविधान में निहित मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—को अपने जीवन में उतारें। सामाजिक दरारें केवल कानून से नहीं, बल्कि संवाद, शिक्षा और संवेदनशील नेतृत्व से कम की जा सकती हैं। न्यायपालिका की भूमिका केवल विवाद सुलझाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज को दिशा देने का भी कार्य करती है। ऐसे समय में जब डिजिटल युग में सूचनाएं तेजी से फैलती हैं, अफवाहें और भ्रामक प्रचार भी समाज को बांट सकते हैं। जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी एक चेतावनी के साथ-साथ एक संदेश भी है कि देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए सभी नागरिकों को मिलकर प्रयास करना होगा। सामाजिक समरसता ही भारत की असली ताकत है, और इसे मजबूत करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।



