
रियल एस्टेट सेक्टर को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से लागू की गई Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 यानी रेरा को लेकर Supreme Court of India ने हालिया सुनवाई के दौरान कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने व्यवस्था के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाते हुए यहां तक टिप्पणी कर दी कि अगर कानून अपने मकसद को पूरा नहीं कर पा रहा, तो इसे बंद कर देना ही बेहतर है। इस टिप्पणी के बाद रियल एस्टेट सेक्टर, राज्य नियामक प्राधिकरणों और घर खरीदारों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पूछा कि जब खरीदारों को समय पर राहत नहीं मिल रही, आदेशों का पालन नहीं हो रहा और परियोजनाएं वर्षों तक लटकी रहती हैं, तो फिर नियामक ढांचा किस काम का है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि कई राज्यों में रेरा की कार्यप्रणाली बेहद धीमी है, जिससे आम लोगों का भरोसा कमजोर पड़ रहा है। घर खरीदने वाले लोग लंबी कानूनी लड़ाइयों में फंस जाते हैं और उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल पाता।
कानून लागू होने के समय उम्मीद थी कि बिल्डरों की मनमानी पर रोक लगेगी, प्रोजेक्ट समय पर पूरे होंगे और खरीदारों का पैसा सुरक्षित रहेगा। शुरुआत में कुछ सकारात्मक नतीजे भी दिखे, लेकिन समय बीतने के साथ शिकायतें बढ़ती गईं। कई मामलों में आदेश जारी होने के बावजूद उनका पालन कराने में दिक्कतें सामने आईं। अदालत की सख्त टिप्पणी इसी पृष्ठभूमि में आई है, जिसने सरकारों और नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी को फिर से केंद्र में ला दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का उद्देश्य कानून को खत्म करना नहीं, बल्कि उसकी प्रभावशीलता बढ़ाना है। अगर राज्यों में बेहतर क्रियान्वयन, सख्त निगरानी और तेज फैसले सुनिश्चित किए जाएं, तो रेरा अभी भी घर खरीदारों के लिए मजबूत ढाल साबित हो सकता है। फिलहाल न्यायालय की टिप्पणी ने यह साफ कर दिया है कि आधे-अधूरे अमल से काम नहीं चलेगा। आने वाले समय में सरकारें इस पर क्या कदम उठाती हैं, इस पर पूरे रियल एस्टेट सेक्टर की नजर टिकी रहेगी।



