
हिमालयी क्षेत्र में हालिया आपदा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत के पास ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों और पहाड़ी नदियों में तेजी से होने वाले बदलावों की पर्याप्त निगरानी व्यवस्था है। नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर से जुड़ी घटना के बाद अचानक आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई और पूरे क्षेत्र की आपदा तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए।
हिमालय में आपदाएं अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। ग्लेशियर का टूटना, बर्फ और चट्टानों का खिसकना, नदी का रास्ता अवरुद्ध होना और उसके बाद अचानक पानी का तेज बहाव—ये घटनाएं कुछ ही समय में विनाशकारी बाढ़ में बदल सकती हैं। ऐसे में केवल मौसम की निगरानी पर्याप्त नहीं है, बल्कि ग्लेशियर और नदी तंत्र की लगातार निगरानी जरूरी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने और पहाड़ी पर्यावरण में बदलाव की गति बढ़ रही है। इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
भारत के लिए चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि हिमालय से निकलने वाली कई नदियां देश के घनी आबादी वाले मैदानी इलाकों तक पहुंचती हैं। ऊपरी हिमालय में होने वाली किसी बड़ी घटना का असर घंटों या दिनों में निचले इलाकों तक पहुंच सकता है। इसलिए सीमापार डेटा साझा करना और समय रहते चेतावनी जारी करना बेहद महत्वपूर्ण है।
हालिया घटनाक्रम के बाद भारत ने संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की निगरानी और पूर्व चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर बढ़ाया है। केंद्र सरकार भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 188 महत्वपूर्ण झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की दिशा में काम तेज कर रही है।
हिमाचल प्रदेश में भी ग्लेशियल झीलों को लेकर खतरे की पहचान की गई है। राज्य में 67 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की पहचान हुई है और सबसे अधिक जोखिम वाली चार झीलों में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लगाने की योजना बनाई जा रही है।
जानकारों के मुताबिक भविष्य की तैयारी केवल सेंसर लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उपग्रह निगरानी, नदी के जलस्तर के रियल-टाइम सेंसर, ग्लेशियरों की निगरानी, ड्रोन और स्थानीय स्तर पर चेतावनी नेटवर्क को एकीकृत करना होगा। इससे किसी संभावित आपदा की जानकारी मिलने और लोगों को सुरक्षित निकालने के बीच मिलने वाला समय बढ़ाया जा सकता है।
नेपाल की हालिया त्रासदी भारत के लिए एक गंभीर चेतावनी है। हिमालय को केवल जल और ऊर्जा संसाधन के रूप में देखने के बजाय इसे अत्यधिक संवेदनशील पारिस्थितिकी और आपदा क्षेत्र के तौर पर समझना होगा। मजबूत निगरानी, सीमापार डेटा साझेदारी, वैज्ञानिक जोखिम आकलन और स्थानीय समुदायों की तैयारी ही भविष्य में ऐसी आपदाओं से होने वाली जान-माल की क्षति को कम कर सकती है।



